DHARMA MAHABHARAT SHASHISHEKHAR TRIPATHI
Dharm : गुरु महान है, गुरु की महिमा गोविंद यानी भगवान से भी ऊंची है।

जब गुरु की आज्ञा का पालन करने के लिए शिष्य ने अपने जीवन की भी नहीं की परवाह, अटूट गुरु भक्ति देखकर किया नामकरण

Dharm : गुरु महान है, गुरु की महिमा गोविंद यानी भगवान से भी ऊंची है। एक शिष्य के लिए गुरु की आज्ञा सर्वोपरि रहती है जिसका पालन करने के लिए वह अपनी जान भी न्योछावर करने को तैयार रहता है। ऐसे ही एक गुरु और गुरुभक्त शिष्य की कथा है। 

गुरु आज्ञा मान बिना विचारे कार्य पूरा करने जुटा शिष्य

पांडवों के वंशज राजा जनमेजय के समय हस्तिनापुर में ऋषि आयोदधौम्य रहा करते थे। उनके तीन प्रमुख शिष्य थे, आरुणि उपमन्यु और वेद। यहां पर हम आरुणि की गुरु भक्ति की चर्चा करेंगे। आरुणि पांचालदेश का रहने वाला था किंतु गुरु से ज्ञान प्राप्त करने के लिए हस्तिनापुर में आया था। बारिश होने को थी जिसका ध्यान करते हुए गुरु ने आरुणि को खेत पर मेड़ बांधने की आज्ञा दी। आरुणि ने गुरु की आज्ञा को शिरोधार्य करते हुए तुरंत ही खेत पर मेड़ बांधने लगा। वह मेड़ बांध ही रहा था कि मूसलाधार बारिश होने लगी। पानी के तेज बहाव में वह जब काफी प्रयास करने के बाद भी मेड़ नहीं बांध सका तो पानी को खेत में रोकने के लिए वह स्वयं ही मेड़ की जगह पर लेट गया जिससे खेत में पानी का भरना रुक गया। 

शिष्य के न लौटने पर, ऋषि को हुई चिंता

इधर काफी समय बीतने के बाद भी जब आरुणि गुरु आश्रम में नहीं लौटा तो गुरु को चिंता हुई और उन्होंने शिष्यों से कहा, आरुणि कहां है? इस पर शिष्यों ने जवाब दिया कि गुरुवर आपने ही तो उसे मेड़ बांधने के लिए भेजा था। तब तक बारिश रुक चुकी थी, गुरुजी शिष्यों को साथ में लेकर खेत की ओर चल दिए। वहां जा कर गुरुजी आवाज देकर जोर जोर से पुकारने लगे, आरुणि तुम कहां हो, आओ बेटा, मैं तुम्हारा इंतजार कर रहा हूं। 

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गुरु ने रख दिया अपने शिष्य का नया नाम

गुरु ने रख दिया अपने शिष्य का नया नाम

आचार्य की आवाज सुन कर आरुणि मेड़ से उठ खड़ा हुआ और गुरु के सामने आकर बोला, गुरुजी मैं यहां पर हूं, उसने पूरी बात बताई कि जब वह खेत में मेड़ बांध कर पानी को नहीं रोक सका तो उस स्थान पर खुद ही लेट गया किंतु अब आपकी आवाज सुनकर आपके पास आया हूं। आचार्य जी ने कहा, तुम मेड़ को तोड़ कर यहां पर आए हो इसलिए तुम्हारा नाम उद्दालक होगा, अर्थात महान शक्ति और दृढता वाला। फिर गुरु ऋषि अयोदधौम्य जिन्हें धौम्य ऋषि भी कहा जाता था, ने कहा, तुमने बिना कुछ सोचे गुरु की आज्ञा का पालन किया है जिससे मैं प्रसन्न हूं। तुम्हारा सदैव कल्याण होगा। गुरु ने उसे सारे वेद और धर्म शास्त्रों का ज्ञाता होने का वरदान दिया।

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