छठ पूजा के पर्व का देश ही नहीं विदेशों में भी बसे पूर्वांचल के लोगों के बीच बहुत महत्व है. कार्तिक महीने में दीपावली के छठवें मुख्य पर्व होता है जिसमें व्रती अस्तांचल और उदयांचल सूर्य को अर्ध्य देते हैं, मुख्य पर्व इस बार सात अक्टूबर को पड़ रहा है और आठ अक्टूबर को प्रातः सूर्य को अर्ध्य देने के साथ ही चार दिन के सूर्य पूजा के इस अनूठे व्रत की पूर्णता होती है. मान्यता है कि खरना के साथ ही छठ मैया व्रती के घर में आ जाती है और फिर सप्तमी को प्रातः घाट पर सूर्य को अर्ध्य देने के साथ ही अपने धाम को जाती है. विधि विधान से छठ मैया की पूजा अर्चना करने वाले भक्तों के सभी दुख दर्द दूर होते हैं और परिवार तथा समाज में उनके मान सम्मान और धन वैभव, समृद्धि में वृद्धि होती है.
राज्याभिषेक के बाद राम व सीता ने भी रखा व्रत
रावण का वध कर लंका पर विजय प्राप्त कर माता सीता और छोटे भाई लक्ष्मण तथा अन्य सहयोगियों के साथ अयोध्या लौटने के बाद वशिष्ठ मुनि के आदेश पर राम राज्य की स्थापना के दिन कार्तिक शुक्ल षष्ठी को भगवान राम और माता सीता ने उपवास कर सूर्यदेव की आराधना की. सूर्यवंशी श्री राम के कुल देवता भी सूर्यदेव ही थे, इसलिए उन्होंने अपनी पत्नी सीता के साथ षष्ठी का व्रत रख कर सप्तमी के दिन उदित होते हुए सूर्यदेव को अर्ध्य देकर उनसे आशीर्वाद प्राप्त किया था.
सूर्यपुत्र कर्ण और द्रौपदी भी देती थीं अर्ध्य
एक अन्य मान्यता के अनुसार छठ पर्व पर अर्घ्य देने की शुरुआत महाभारत काल में हुई थी. सबसे पहले सूर्य पुत्र कर्ण ने सूर्य देव को जल का अर्घ्य देकर यह परम्परा शुरु की थी. आज भी सूर्य षष्ठी में सूर्य को अर्घ्य देने की यही पद्धति अपनाई जाती है. कुछ कथाओं के अनुसार पांडवों की पत्नी द्रौपदी ने भी अपने परिवार की सुरक्षा के लिए सूर्य की पूजा की थी. वह अपने परिजनों के उत्तम स्वास्थ्य, लंबी उम्र और जीवन के हर संघर्ष में विजय की कामना के लिए सूर्य की पूजा करती थीं.
