Dharma : महर्षि वशिष्ठ द्वारा राजा संवरण का सूर्यदेव की पुत्री से विवाह कराने और राज्य में सूखा पड़ने पर तपस्या से वर्षा करवाने की बात सुन अर्जुन ने चित्ररथ से कहा, हे गंधर्वराज ! हमारे पूर्वजों के पुरोहित महर्षि वशिष्ठ कौन थे ? उनके बारे में विस्तार से बताएं।
गंधर्वराज ने बताया महर्षि वशिष्ठ का परिचय
गंधर्व ने कहा, महर्षि वशिष्ठ ब्रह्मा जी के मानस पुत्र हैं। उनकी पत्नी का नाम अरुन्धती है। उन्होंने तप कर काम और क्रोध पर विजय प्राप्त की और इंद्रियों को वश में किया इसलिए नाम वशिष्ठ पड़ा। महर्षि विश्वामित्र ने बहुत से अपराध किए फिर भी महर्षि वशिष्ठ के क्रोध करने के बजाय उन्हें क्षमा कर दिया। यहां तक कि सौ पुत्रों का नाश कर दिया, वे बदला लेने में सक्षम थे, वे यमलोक से पुत्रों को ला सकते थे किंतु उन्होंने यमराज के नियमों का उल्लंघन नहीं किया। उन्हीं को पुरोहित बना कर इक्ष्वाकुवंशी राजाओं ने पृथ्वी पर विजय प्राप्त कर कई यज्ञ किए। आप लोग भी वैसे ही किसी धर्मात्मा और वेदज्ञ ब्राह्मण को पुरोहित बनाइए।
वशिष्ठ मुनि के आतिथ्य से प्रसन्न हुए राजा विश्वामित्र
इतना सुनने के बाद अर्जुन का प्रश्न था, हे गंधर्वराज ! दोनों ऋषि आश्रमवासी थे फिर वैर का कारण क्या रहा। गंधर्वराज चित्ररथ ने उनके प्रश्न का उत्तर देते हुए कहा, हे अर्जुन ! कान्यकुब्ज देश में गाधि नाम के बहुत बड़े राजा गाधि राजा कुशिक के पुत्र थे। उन्हीं से विश्वामित्र का जन्म हुआ। एक बार विश्वामित्र अपने मंत्री के साथ मरुधन्व देश में शिकार खेलते-खेलते वशिष्ठ मुनि के आश्रम में पहुंच गए। मुनि ने उनका आदर सत्कार किया और अपनी कामधेनु नंदिनी (गाय) से प्राप्त बढ़िया स्वादिष्ट भोजन कराया। प्रसन्न होकर उन्होंने महर्षि वशिष्ठ से कहा, ब्राह्मन ! आप मुझसे एक अर्बुद अर्थात 10 करोड़ गौएं और आधा राज्य लेकर मुझे अपनी कामधेनु गाय दे दीजिए। महर्षि ने विनम्रता पूर्वक कहा, मैने यह दुधारु गाय देवता, अतिथि, पितर और यक्षों के लिए रख छोड़ी है। आपके राज्य के बदले यह देने योग्य नहीं है। विश्वामित्र बोले, मैं क्षत्रिय हूं और ब्रह्मन ! आप शांत महात्मा हैं इसकी रक्षा कैसे कर पाएंगे। मैं बलपूर्वक ले जा सकता हूं।
विश्वामित्र के सैनिक कामधेनु को जबरन खींचने लगे
वशिष्ठ जी ने कहा, फिर देरी किस बात की, आप बलवान क्षत्रिय हैं चाहें तो तुरंत ही कर सकते हैं। विश्वामित्र जबर्दस्ती गाय को हंकवाकर ले जाने लगे लेकिन गाय तो वशिष्ठ जी के पास जाकर खड़ी हो गयी तो उन्होंने कहा, हे कल्याणी ! मैं तुम्हारा क्रंदन सुन रहा हूं, मैं क्षमाशील प्राणी हूं क्या करूं लाचार हूं। नंदिनी ने कहा, भगवन ! ये लोग मुझे चाबुक और डंडों से पीट रहे हैं, आप मेरी उपेक्षा क्यों कर रहे हैं। मुझे कोई बलपूर्वक तो नहीं ले जा सकता है। वशिष्ठ जी ने जवाब दिया, हे कल्याणी ! मैंने तुम्हें छोड़ा नहीं है तुम्हारे में शक्ति है तो रुक जाओ। देखो तुम्हारे बच्चे को ये लोग रस्सी से खींच कर लिए जा रहे हैं।
कामधेनु नंदिनी के शरीर से निकले योद्धा
इतना सुनते ही नंदिनी की आंखें लाल हो गयीं और जोर से आवाज करने लगी जिससे डरकर सैनिक भाग खड़े हुए। उन लोगों ने फिर से कोशिश की तो वह सूर्य के समान चमकने लगी और उसके रोमों से आग बरसने लगी। उसके अंगों से प्रह्लव, द्रविण, शक, यवन, किरात आदि प्रकट हुए और घातक हथियाों से विश्वामित्र के सैनिकों पर टूट पड़े। सेना को बहुत दूर भागना पड़ा। इस ब्रह्मतेज को देख विश्वामित्र अपने को धिक्कारने लगे और समझ गए ही ब्रह्मतेज का बल ही सच्चा बल है। इन दोनों बलों में तपोबल मुख्य ऐर यह सोच अपना राज्य छोड़ वे तपस्या करने लगे तथा सिद्धि और ब्राह्मणत्व प्राप्त किया।