अर्जुन ने कहा हम लोग तो कुन्ती केधृतराष्ट्र द्वारा पूछने पर भीष्म पितामह और गुरु द्रोण ने क्या पांडवों को राज्य देने की सलाह दी या आक्रमण की ? पुत्र हैं फिर तुमने तपतीनंदन क्यों कहा। ये तपती कौन थीं ?
Dharma : धृतराष्ट्र द्वारा पूछने पर भीष्म पितामह और गुरु द्रोण ने क्या पांडवों को राज्य देने की सलाह दी या आक्रमण की ?
Dharma : भीष्म पितामह ने दुर्योधन को समझाते हुए कहा, हे प्रिय ! यदि यह राज्य पांडवों को नहीं मिलेगा तो तुम या भरतवंश का कोई भी पुरुष अपने को उस राज्य का उत्तराधिकारी कैसे कह सकेगा। तुम जो अभी राजा बने बैठे हो, यह धर्म के विरुद्ध है। तुमसे भी पहले वे राज्य के अधिकारी हैं। तुम्हें तो हंसी-खुशी से उनका राज्य लौटा देना चाहिए। इसी में तुम्हारा और सब लोगों का भला है अन्यथा नहीं।
भीष्म बोले, दुर्योधन तुम माथे पर कलंक न लगवाओ
पितामह ने आगे कहा, तुम अपने माथे पर कलंक का टीका क्यों लगवाना चाहते हो। जब से मैंने सुना कि कुन्ती और पांचों पांडव भस्म हो गए, मेरी आंखों के सामने अंधेरा छा गया था। उनके जलने का दोष जितना तुम पर लगाया गया था उतना पुरोचन पर नहीं। अब पांडवों को जीवित रहने और मिलने से तुम अपने पर लगा दोष मिटा सकते हो। पांडवों के जीवित रहते स्वयं इंद्र भी उन्हें उनके राज्य से दूर नहीं कर सकते। वे बुद्धिमान और धर्मात्मा तो हैं ही, आपस में मेलजोल के साथ रहते हैं। तुमने उन्हें राज्य से दूर रखने के बहुत से प्रयास किए जो अधर्म है। धृतराष्ट्र को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा, मैं तुम्हें स्पष्ट रूप से अपनी राय बताए देता हूं। यदि तुम्हें धर्म से रत्ती भर भी प्रेम है और तुम मेरा प्रिय तथा अपना कल्याण चाहते हो तो शीघ्रता के साथ पांडवों को आधा राज्य लौटा दो। इतना बोल कर पितामह भीष्म शांत हो गए।
आचार्य द्रोण ने भी भीष्म की बात का किया समर्थन
उनके बाद आचार्य द्रोण ने कहा, धृतराष्ट्र ! मित्रों का यही धर्म है कि जब उनसे कोई सलाह पूछी जाए तो वे धर्म, अर्थ और यश की वृद्धि करने वाली राय दें। मैं महात्मा भीष्म के सुझाव से सहमति व्यक्त करता हूं। सनातन धर्म के अनुसार मैं यही उचित समझता हूं कि उन्हें आधा राज्य दे दिया जाए। आप किसी अपने प्रिय को द्रुपद की राजधानी भेजिए जो पांडवों और नववधू द्रौपदी के लिए तरह-तरह के उपहार लेकर जाए और उन्हें सम्मान सहित लेकर आने का प्रयास करे।