Dharma : जब पांचाल सम्राट द्रुपद को युधिष्ठर ने बताया कि द्रौपदी हम सबकी पटरानी बनेगी क्योंकि मेरी मां ने ऐसा ही कहा है तो द्रुपद चौंक गए। वो अभी चर्चा ही कर रहे थे कि भगवान वेदव्यास भी वहां आ गए तो सबने उनके सामने इस प्रश्न को रखकर हल मांगा। भगवान वेदव्यास ने कहा पहले तुम लोग अपने विचार व्यक्त करो फिर हम कुछ बताएंगे। सबसे पहले द्रुपद ने कहा, मैं तो ऐसा समझता हूं कि ऐसा करना अधर्म और लोकाचार, वेदाचार तथा सदाचार के विपरीत है। धृष्टघुम्न बोले, भगवन ! मेरा भी यही मत है कि कोई सदाचारी पुरुष अपनी पत्नी के साथ कैसे सहवास कर सकता है।
युधिष्ठिर और कुन्ती ने रखे विचार
युधिष्ठिर ने अपना पक्ष रखते हुए कहा, मैं आप लोगों के सामने फिर से दोहराता हूं कि मेरी वाणी से कभी झूठी बात नहीं निकलती है। मेरी बुद्धि ने मुझे स्पष्ट आदेश दिया है कि यह अधर्म नहीं है। कुन्ती ने कहा, मेरा बेटा बहुत ही धर्मात्मा है, उसने जो कुछ कहा बात वैसी ही है। मुझे अपनी वाणी मिथ्या होने का भय है। अब आप ही कोई ऐसा उपाय बताइए जिससे मैं असत्य से बच जाऊं।
व्यास जी राजा द्रुपद को एकांत में ले गए
सबकी बातें सुनने के बाद व्यास जी ने कहा, हे कल्याणि ! इसमें संदेह नहीं कि असत्य से तुम्हारी रक्षा हो जाएगी। द्रुपद ! युधिष्ठिर ने जो कुछ भी कहा है वह धर्म के प्रतिकूल नहीं बल्कि अनुकूल ही है। मैं एक रहस्य की बात बताना चाहता हूं जो तुम्हें अकेले में ही बता सकता हूं। इतना बोल कर व्यास जी उठे और द्रुपद का हाथ पकड़ कर एकांत में ले गए। व्यास जी ने उन्हें द्रौपदी के पहले के दो जन्मों की कथा सुनायी और बताया कि भगवान शंकर के वरदान के कारण ही ये पांचों भाई द्रौपदी के पति होंगे। इसके बाद उन्होंने कहा मैं प्रसन्नतापूर्वक तुम्हें दिव्य दृष्टि देता हूं जिसके द्वारा तुम इन पांडवों के पूर्वजों के शरीर को देख सकोगे। द्रुपद ने भगवान वेदव्यास द्वारा मिली दिव्य दृष्टि से देखा कि पांचों पांडवों के दिव्य स्वरूप चमक रहे हैं। उन्होंने यह भी देखा कि उनकी पुत्री द्रौपदी भी दिव्यता के साथ चमक रही है। इस दिव्य झांकी को देखकर द्रुपद ने आश्चर्यचकित होकर व्यास जी के चरण पकड़ लिए और बोले, भगवन ! मैने आपके मुख से जब तक अपनी कन्या के पूर्व जन्म की बात नहीं सुनी थी और यह दृश्य नहीं देखा था तभी तक मैं युधिष्ठिर की बात का विरोध कर रहा था किंतु जब विधाता का ऐसा ही विधान है तो उसे कौन टाल सकता है। आपकी जैसी आज्ञा है, वैसा ही होगा। फिर भगवान शंकर ने ऐसा ही वरदान दिया है उसमें मेरा कोई अपराध नहीं समझा जाएगा। अब मैं प्रसन्नता पूर्वक अपनी पुत्री का पांचों पांडवों के साथ पाणिग्रहण करूंगा क्योंकि द्रौपदी इन पांचों भाइयों की पत्नी के रूप में प्रकट हुई है।