Dharma : युधिष्ठिर के युवराज बनने और फिर बाद में राजा बनने को लेकर दुर्योधन ने अपने और अपने परिवार के भविष्य कि चिंता पिता महाराज धृतराष्ट्र से करते हुए कहा कि उन्हें राज्य से अलग करने की कोई योजना तो बनानी ही पड़ेगी। उसने कहा पिताजी ! आप किसी तरह से पांडवों को वारणावत नाम के नगर तक भेज दीजिए, बाकी काम आप मुझ पर छोड़ दीजिए। तब तक मैं राज्य पर कब्जा कर लूंगा फिर वो आ भी जाएं तो कोई फर्क नहीं पड़ता।
धृतराष्ट्र संग दुर्योधन ने की गुप्त मीटिंग
धृतराष्ट्र ने दुर्योधन को संबोधित करते हुए कहा, बेटा ! चाहता तो मैं भी यही हूं लेकिन यह पापपूर्ण बात कहने में संकोच लग रहा है। भीष्म, द्रोण, कृपाचार्य और विदुर की इसमें सहमति नहीं है। दुर्योधन बोला, पिताजी ! भीष्म तो कौरव और पांडवों के बीच में हैं, अश्वत्थामा मेरे साथ हो तो द्रोण भी उसके खिलाफ नहीं जाएंगे। कृपाचार्य अपनी बहन, बहनोई और भांजे को नहीं छोड़ सकते। रही बात विदुर की तो वो पांडवों से गुपचुप मिलते हैं, अकेले वो क्या कर सकेंगे। इसलिए आप बिना किसी शंका के कुंती और पांडवों को वारणावत भेज दीजिए। तभी मुझे शांति मिल सकेगी।
पांडवों को दूर करने के लिए दिया घूमने का लालच
इसके बाद दुर्योधन हस्तिनापुर की प्रजा को खुश करने में लग गया और धृतराष्ट्र ने कुछ मंत्रियों को इस काम में लगाया तो वे पांडवों से वारणावत की प्रशंसा कर उन्हें वहां पर जाने को उकसाने लगे। हर किसी से वारणावत की प्रशंसा सुन पांडवों के मन में भी उस स्थान को एक बार देखने की इच्छा जागृत हो गयी। उपयुक्त अवसर जान धृतराष्ट्र ने पांडवों को अपने पास बुलाया और कहा, पुत्रों ! लोग मुझसे वारणावत की बहुत तारीफ करते है, यदि तुम लोग वहां पर जाना चाहते हो तो जा सकते हो। इन दिनों वहां पर बहुत बड़ा मेला भी लगता है। तुम लोग जाओ और ब्राह्मणों तथा गवैयों को खूब दान देना और तेजस्वी देवताओं की तरह घूम कर लौट आओ। पांडवों की तरफ से युधिष्ठिर महाराज की चाल को समझ गए और फिर बोले, आपकी जैसी आज्ञा हो। इतना कह कर उन्होंने सबको प्रणाम कर कहा, हम लोग महाराज की आज्ञा से वारणावत जा रहे हैं आप लोग प्रसन्नता पूर्वक हमें आशीर्वाद प्रदान करें कि वहां हमें पाप छू भी न सके। सबने मंगलकामना के साथ विदा किया।