भगवान वेद व्यास जी के परमशिष्य रोमहर्षण चूंकि सूत समाज के थे इसीलिए वे सूत जी के रूप में विख्यात हुए।

Shri Bhaktamal : श्री सूत जी की कथा

Shri Bhaktamal : भगवान वेद व्यास जी के परमशिष्य रोमहर्षण चूंकि सूत समाज के थे इसीलिए वे सूत जी के रूप में विख्यात हुए। भगवान व्यास ने इन्हें पुराणों को पढ़ाने के बाद आशीर्वाद दिया कि तुम पुराणों के श्रेष्ठ वक्ता बनो। यही कारण है कि सूत जी हमेशा ऋषियों के आश्रमों में घूमते और उनके आग्रह पर पुराणों की कथा सुनाते थे। 

श्री भक्तमाल ग्रंथ के अनुसार नैमिषारण्य के बारे में मान्यता है कि वहां 88 हजार ऋषि वास करते हैं और सूत जी उनके यहां सदैव कथा कहा करते थे। पुराणों के वक्ता होने के कारण ही ऋषि उन्हें बिठाकर पूजा कर सम्मान देते। उनकी वक्ताशैली इतनी जबर्दस्त होती थी कि सूत जी जहां भी जाते, आसपास के ऋषि मुनि भी दौड़ कर वहां पहुंच जाते थे। पहले तो वे ऋषियों का आदर करते हुए उनकी कुशलक्षेम जानते और फिर पूछते कि आप कौन सी कथा सुनना चाहते हैं। 

ऋषियों के कहने पर वे पुराणों के आधार पर कथा सुनाते और कहते थे कि ऐसी कोई बात ही नहीं है जिसका वर्णन पुराणों में न मिलता हो। वे कोई भी कथा सुनाने के पहले अपने गुरु का स्मरण करते हुए यह जरूर कहते कि मैंने अपने गुरु भगवान व्यास से जो कुछ भी सुना, उसे ही आप लोगों को सुनाता हूं, आप लोग भी उसे ध्यान से सुनिए। वो सदैव भगवान की लीला के कीर्तन में लगे रहते। 

उनकी मृत्यु की कथा भी परम्परा, मान-सम्मान और अभिमान से भरी है। एक बार नैमिषारण्य में बलराम जी पहुंचे, उस समय सूत जी ऋषियों को कथा सुना रहे थे। व्यास गद्दी का सम्मान सर्वोच्च होने के कारण सूत जी उन्हें देख कर भी नहीं उठे। बस इसी बात पर बलराम जी को क्रोध आ गया और उनका सिर काट दिया। इस घटना पर ऋषियों ने बलराम जी से कहा कि यह उन्होंने अच्छा नहीं किया। इन्हें उच्च आसन तो हम लोगों ने दिया था, आपको ब्रह्महत्या का पाप लगेगा और आपको इसका प्रायश्चित करना पड़ेगा। ऋषियों की आज्ञा के अनुसार बलराम जी ने प्रायश्चित किया और रोमहर्षण जी के पुत्र उग्रश्रवा को उनके स्थान पर बैठाया गया, तभी से रोमहर्षण जी के स्थान पर उग्रश्रवा जी पुराणों की कथा सुनाने लगे, उनमें अपने पिता के सभी गुण विद्यमान थे।

   

Leave a Reply