Omkareshwar : मध्यप्रदेश के मालवा क्षेत्र के खंडवा जिले में एक ऐसा मंदिर है जहां भगवान शिव 33 कोटि देवताओं संग विराजते हैं। रहस्यों से भरा यह मंदिर महत्वपूर्ण ज्योतिर्लिंगों में आता है बल्कि इसका उल्लेख भी द्वादश ज्योतिर्लिंग में किया गया है जिसे ओंकारेश्वर कहा जाता है। नर्मदा नदी के बीच में यह शिवपुरी नामक द्वीप पर स्थित है जिसे मन्धाता भी कहा जाता है। इस द्वीप की पहाड़ी हिंदू धर्म के पवित्र चिन्ह ओम् के आकार में होने के कारण ही ओंकारेश्वर कहलाता है। यहां पर बगल में ही एक और मंदिर है ममलेश्वर और दोनों मंदिरों को मिलाकर ओंकारेश्वर-ममलेश्वर कहा जाता है। धार्मिक मान्यता के अनुसार ओंकारेश्वर ज्योर्तिलिंग के आस-पास कुल 68 तीर्थ स्थित हैं।
महादेव का यह मंदिर विभिन्न मान्यताओं और रहस्यों से जुड़ा है मान्यता है कि यहां पर महादेव 33 कोटि देवताओं संग विराजते हैं
महादेव मंदिर का रहस्य
महादेव का यह मंदिर विभिन्न मान्यताओं और रहस्यों से जुड़ा है। मान्यता है कि यहां पर महादेव 33 कोटि देवताओं संग विराजते हैं इसलिए यहां के दर्शन और जलाभिषेक करने से भोलेनाथ के साथ ही सारे देवता भी संतुष्ट हो जाते हैं। दूसरी मान्यता के अनुसार भोलेनाथ माता पार्वती संग रोज तीनों लोकोंं का भ्रमण कर रात में शयन करने आते हैं, इतना ही नहीं शयन करने के पहले वे माता के साथ चौसर भी खेलते हैं इसलिए रोज शयन आरती के बाद मंदिर में चौसर बिछा दी जाती है। आश्चर्य की बात है कि रात में ठीक से बिछाई गयी चौसर के बाद मंदिर में कोई प्रवेश नहीं करता किंतु जब सुबह मंदिर का द्वार खोला जाता है वहां पर चौसर के पासे बिखरे हुए मिलते हैं। एक अन्य मान्यता के अनुसार यहां पर शिव जी के अनन्य भक्त धन के देवता कुबेर ने शिवलिंग की स्थापना पर घोर तपस्या की तो वे प्रसन्न हुए और जिस पर कुबेर ने उनसे इसी स्थान पर भोलेनाथ के वास करने की प्रार्थना की जिसे पूरी करने के साथ ही उन्होंने कुबेर को धनपति बना दिया। कुबेर के स्नान के लिए शिव जी ने अपनी जटा के बाल से कावेरी नदी उत्पन्न की थी, जो नर्मदा जी में जाकर मिलती हैं। महादेव के इस चमत्कारी और रहस्यमयी ज्योतिर्लिंग को लेकर यह भी मानना है कि इस पावन तीर्थ पर पवित्र नर्मदा का जल चढ़ाए बगैर व्यक्ति की सारी तीर्थ यात्राएं अधूरी मानी जाती है। धर्मशास्त्रों के अनुसार यमुना जी में 15 दिन और गंगा जी में 7 दिन के स्नान का जो फल प्राप्त होता है, उतना पुण्य नर्मदा जी के दर्शन मात्र से प्राप्त हो जाता है। यह भी कहा जाता है कि यहां पर दर्शन एवं पूजन करने से व्यक्ति पाप मुक्त हो जाता है।
मंदिर का इतिहास
सदियों पहले भीलों ने इस स्थान पर अपने लोगों की बस्ती बनाई और रहने लगे। ओंकारेश्वर वास्तव में भील राजाओं की राजधानी हुआ करती थी। ओंकारेश्वर नगरी का एक नाम मान्धाता भी है। राजा मान्धाता ने यहां नर्मदा किनारे इस पहाड़ी पर घोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और शिव जी के प्रकट होने पर उनसे यहीं निवास करने का वरदान मांगा। इसलिए यह तीर्थ नगरी ओंकार-मान्धाता के रूप में पुकारी जाने लगी। रानी अहिल्याबाई होलकर ने यहां पर नित्य 18 सहस्र शिवलिंग तैयार कर उनका विधि विधान से पूजन कर उन्हें नर्मदा में विसर्जित करती थीं।
शिवरात्रि और धनतेरस पर लगती है भीड़
महाशिवरात्रि के अवसर पर इस मंदिर में शिवभक्तों की भारी भीड़ दर्शन और पूजन के लिए उमड़ती है। इसी को ध्यान में रखते हुए महाशिवरात्रि के अवसर पर भगवान शिव का यह ज्योतिर्लिंग 24 घंटे दर्शन के लिए खुला रहने लगा है, ताकि कोई भी भक्त निराश हो बिना दर्शन के न लौटे। प्रत्येक वर्ष दीपावली पर द्वादशी की रात को यहां ज्वार चढ़ाने का महत्व है, रात्रि भर जागरण के बाद त्रयोदशी यानी धनतेरस को ब्रह्म मुहूर्त में बाबा का अभिषेक किया जाता है। फिर कुबेर महालक्ष्मी यज्ञ होता है जिसमें कई जोड़े यजमान बनते हैं। इसके साथ ही मंदिर प्रबंधन की तरफ से लक्ष्मी वृद्धि पैकेट जिसे सिद्धि भी कहा जाता है, का वितरण होता है। इस सिद्धि को लोग घर ले जाकर दीपावली की अमावस्या को विधि के अनुसार धन के स्थान पर रखने से प्रचुर मात्रा में धन के साथ ही सुख शांति की प्राप्ति होती है।