Dharma : युधिष्ठिर और माता कुन्ती ने जैसे ही हिडिम्बा के साथ भीमसेन को विवाह कर पुत्र को जन्म देने की अनुमति दी, वह भीम को लेकर आकाश मार्ग से उड़ने लगी। अब हिडिम्बा ने सुंदरी का रूप रख आकर्षक आभूषण पहने और जगह-जगह घूमने लगी। समय आने पर उसके गर्भ से एक पुत्र का जन्म हुआ।
भीम और हिडिम्बा से हुआ पुत्र का जन्म
ऋषि वैशम्पायन ने राजा जनमेजय को आगे की कथा बताते हुए कहा कि जन्म होने के कुछ देर बाद ही वह बहुत विशाल राक्षसों के समान हो गया। हिडिम्बा के इस बालक के सिर पर बाल नहीं थे, उसन धनुष धारण किए माता-पिता के पास आकर प्रणाम किया। माता-पिता ने उसके सिर जिसे “घट” भी कहते हैं को देखा जो “उत्कच” यानी बाल विहीन था इसलिए उसका नाम “घटोत्कच” रख दिया। कुछ दिनों के बाद हिडिम्बा और भीमसेन अपने विशालकाय पुत्र “घटोत्कच” को लेकर पांडवों और माता कुन्ती के पास पहुंचे तो “घटोत्कच” ने उन्हें प्रणाम किया। अब हिडिम्बा ने सोचा कि भीमसेन की प्रतिज्ञा तो पूरी हो गयी है इसलिए वहां से चलने लगी तो “घटोत्कच” ने पांडवों से विनम्रता पूर्वक कहा कि आप लोग हमारे पूजनीय हैं इसलिए निसंकोच बताएं कि मैं आपकी क्या सहायता करूं।
माता कुन्ती ने घटोत्कच से लिया वचन
कुन्ती ने “घटोत्कच” से कहा कि बेटा तू कुरुवंश में जन्मा है और स्वयं भीमसेन के समान है इसलिए समय आने पर इनकी सहायता करना। “घटोत्कच” ने कहा कि मैं कोई भी कार्य कर सकने सक्षम हूं इसलिए जब भी आप लोगों को मेरी आवश्यकता लगे, आप मुझे याद करें। मैं तुरंत ही आप लोगों की सहायता के लिए उपस्थित हो जाऊंगा इस कार्य में तनिक भी देर नहीं लगेगी। इतना कह कर वह उत्तर दिशा की ओर चला गया। दरअसल, देवराज इंद्र ने कर्ण की शक्ति का प्रहार सहन करने के लिए ही “घटोत्कच” के जन्म की कहानी रची थी।