Dharma : राजा द्रुपद का पांडवों के दामाद बनने की खबर पाकर जब दुर्योधन अपने पिता महाराज धृतराष्ट्र से तरह-तरह की साजिश करने की बात कर रहा था, तभी वहां उपस्थित कर्ण ने कहा पांडवों में मनमुटाव नहीं कराया जा सकता है क्योंकि सबका प्रेम एक ही स्त्री में है और वह उन्हें विवाह में प्राप्त हुई है। राजा द्रुपद भी एक श्रेष्ठ व्यक्ति हैं और धन के लालची नहीं हैं। तुम अपना सारा राज्य देकर भी द्रुपद को पांडवों का विरोधी नहीं बना सकते हो। इसलिए जब तक श्री कृष्ण यादवों की सेना लेकर पांडवों को राज्य दिलाने के लिए राजा द्रुपद के यहां नहीं पहुंचते हैंं, तभी तक तुम अपना पराक्रम दिखा सकते हो।
कर्ण ने की स्थितियों की समीक्षा
कर्ण ने आगे कहा, बात यह है कि श्री कृष्ण पांडवों के लिए अपनी अपार संपत्ति, सारे भोग और राज्य यानी सब कुछ छोड़ने में भी नहीं हिचकेंगे। इसलिए सारी स्थितियों पर विचार करने के बाद मेरी राय है कि हम लोग अभी एक बहुत बड़ी सेना लेकर अभी चढ़ाई कर दें और द्रुपद को हराकर पांडवों को पराक्रम से ही मार डालें क्योंकि पांडवों को साम, दान और भेद नीति से वश में नहीं किया जा सकता है। उन वीरों को तो केवल वीरता से ही मार डालना चाहिए।
सबकी मीटिंग में विचार करने का हुआ निर्णय
कर्ण की बात सुनने के बाद धृतराष्ट्र ने कहा, बेटा कर्ण ! तुम शस्त्रास्त्र में तो कुशल हो ही, नीति कुशल भी हो। तुमने जो कहा वह सर्वथा तुम्हारे अनुरूप है। परन्तु मेरा विचार है कि आचार्य द्रोण, भीष्म पितामह, विदुर और तुम दोनों मिलकर इस बारे में विचार कर कोई ऐसा उपाय निकालो जिससे मिलने वाला परिणाम सबके लिए सुखद हो। इतना कह कर धृतराष्ट्र ने पितामह, आचार्य आदि सभी लोगों को बुलवाया और गुप्त स्थान पर एकत्र हो कर विचार करने लगे।
भीष्म पितामह ने कही नीति की बात
धृतराष्ट्र द्वारा बुलाई गयी मीटिंग में भीष्म पितामह ने साफ कहा, मुझे पांडवों के साथ वैर या विरोध करना बिल्कुल भी पसंद नहीं। मेरे लिए धृतराष्ट्र और पांडु दोनों के लड़के एक समान ही हैं। मेरा धर्म है पाण्डवों की रक्षा करना, वैसा ही तुम लोगों का भी है। मैं किसी भी कीमत पर पाण्डवों से झगड़ा करने का समर्थन नहीं कर सकता हूं। तुम लोग उनके साथ मेल मिलाप का व्यवहार करो और आधा राज्य उन्हें दे दो। जैसे तुम इस राज्य को अपने बाप-दादों का समझते हो उसी तरह यह उनके भी बाप-दादों का है।