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Dharma : पांडवों का परिचय जानने के लिए राजा द्रुपद ने कौन सी बनायी योजना, क्या हुए वे सफल

Dharma : पुत्र धृष्टघुम्न स द्रौपदी की ससुराल के बारे में जानकारी मिलने पर राजा द्रुपद को बहुत ही प्रसन्नता हुई। उन्होंने तुरंत ही अपने पुरोहित को उनका पूरा परिचय जानने के लिए भेजा तो पुरोहित ने पहुंच कर पांडवों से कहा, आप लोग चिरंजीवी हों, पांचाल राज महात्मा द्रुपद ने आशीर्वाद पूर्वक आप लोगों का परिचय जानना चाहा है। महाराज द्रुपद की इच्छा थी कि उनकी पुत्री का विवाह विशालबाहु नवरत्न अर्जुन के साथ हो। उन्होंने यह संदेश भेजा है कि यदि भगवत्कृपा से मेरी यह अभिलाषा पूरी हुई हो तो बहुत ही आनंद की बात है। 

पुरोहित ने युधिष्ठिर से पूछा उनका परिचय

युधिष्ठिर की आज्ञा पाते ही भीमसेन ने पुरोहित का यथोचित सत्कार किया। पुरोहित द्वारा आतिथ्य और पूजा ग्रहण करने के बाद युधिष्ठिर ने कहा भगवन ! राजा द्रुपद ने स्वयंवर कर अपनी पुत्री का विवाह करने का निर्णय लिया था जो क्षत्रिय धर्म के सर्वथा अनुकूल है। स्वयंवर करने का उद्देश्य किसी भी व्यक्ति के साथ पुत्री का विवाह करना तो नहीं था। इस वीर ने उनके नियमों का पालन करते हुए भरी सभा में उनकी पुत्री को प्राप्त किया है। अब राजा द्रुपद को पछताने की कोई आवश्यकता नहीं है। इसके द्वारा उनकी चिरकालीन अभिलाषा भी पूरी हो सकती है। 

राजा द्रुपद ने पांडवों को भोजन पर बुलाया

जिस समय युधिष्ठिर पुरोहित से वार्ता कर रहे थे, उसी समय द्रुपद के दरबार से एक संदेशवाहक आया। उसने धर्मराज युधिष्ठिर को प्रणाम कर कहा, महाराज द्रुपद ने आप लोगों के भोजन के लिए रसोई तैयार करा ली है, आप लोग नित्यकर्म से निवृत्त होकर राजकुमारी कृष्णा (द्रौपदी) के साथ वहां चलिए। सुंदर घोड़ों से जुते रथ आपकी प्रतीक्षा में खड़े हैं। युधिष्ठिर ने माता कुन्ती और द्रौपदी को एक रथ में बैठाया और पांचों भाई पांच विशाल रथों में बैठकर राजभवन के लिए रवाना हुए। राजा द्रुपद ने पांडवों की प्रकृति और स्वभाव को परखने के लिए राजमहल में फल, फूल, आसन, गाय, रस्सियां, बीज और खेती के सामान सजाए थे। दूसरी ओर शिल्पकला में काम आने वाले औजार थे। एक तरफ तरह-तरह के खिलौने और दूसरी ओर तलवार, घोड़े, रथ, कवच, धनुष-बाण, शक्ति आदि युद्ध से संबंधित सामग्री रखा दी थीं। 

युधिष्ठिर ने खोल दिया राज

जैसे ही पांडवों का रथ राजभवन में पहुंचा, माता कुन्ती और राजकुमारी द्रौपदी को रनिवास में भेज दिया गया जहां उनकी बढ़चढ़ कर अगवानी होने लगी। पांडवों के लिए राजोचित आसन लगे थे, जिन पर वो लोग जाकर बैठ गए। दास-दासी सुंदर भोजन परोसने लगे जिन्हें उन लोगों उचित तरीके से ग्रहण किया। इसके बाद महल दिखाने के नाम पर राजा द्रुपद ने सबसे पहले उन्हें उस कक्ष में ले गए जहां अस्त्र-शस्त्र रखे थे। उन्हें देखने के तरीके से राजा समझ गए कि ये पांडवकुमार ही हैं। पांचालराज ने युधिष्ठिर को अलग बुलाकर पूछा, आप लोग किस वर्ण से हैं यह हम कैसे पता करें। धर्मराज ने कहा, हे राजेन्द्र ! आपकी अभिलाषा पूरी हुई, मैं महात्मा पांडु का पुत्र युधिष्ठिर और ये चारो मेरे छोटे भाई भीमसेन, अर्जुन, नकुल और सहदेव हैं। मेरी माता कुन्ती रनिवास में द्रौपदी के साथ हैं।     

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