Dharma : महाराज धृतराष्ट्र के आदेश और दुर्योधन की कुटिल योजना की तरह युधिष्ठिर अपने भाइयों और मां कुन्ती के साथ वारणावत के लिए चले तो हस्तिनापुर की प्रजा भी उनके साथ चल पड़ी। प्रजा ने कहा कि जहां पर धर्मात्मा युधिष्ठिर रहेंगे वही उनके लिए स्वर्ग के समान है। हस्तिनापुर की प्रजा का इस तरह का प्रेम देख कर युधिष्ठिर ने उन्हें संबोधित करते हुए कहा, हे मेरे नगरवासियों ! राजा धृतराष्ट्र हमारे पिता परम मान्य और गुरु हैं। वे जो कुछ भी कहेंगे, हम निसंकोच उस कार्य को करेंगे। यह हमारी प्रतिज्ञा है। यदि आप लोग हमारे हितैषी और मित्र हैं तो आशीर्वाद पूर्वक हमें दाहिने करके आप लोग लौट जाइए। जब हमारे काम में कोई अड़चन पड़े तो आप लोग हमारा हित करिएगा।
संकेत में युधिष्ठिर को बतायी गूढ़ बात
युधिष्ठिर की बात सुन कर प्रजा हस्तिनापुर की ओर लौट गयी। सबके लौट जाने के बाद अनेक भाषाओं के ज्ञाता विदुर जी ने युधिष्ठिर को सांकेतिक भाषा में कहा, नीतिज्ञ पुरुष को शत्रु का मनोभाव समझ कर उससे अपनी रक्षा करनी चाहिए। एक ऐसा अस्त्र है जो लोहे का तो नहीं है किंतु शरीर को नष्ट कर सकता है। यदि शत्रु के इस दांव को कोई समझ ले तो वह मृत्यु से बच सकता है। उनका आशय था कि शत्रुओं ने तुम्हारे लिए ऐसा भवन तैयार कराया है, जो आग से भड़कने वाले पदार्थों से बना है। उन्होंने आगे कहा कि आग घास-फूस और सारे जंगल को जला डालती है। किंतु बल में रहने वाले जीवन उससे अपनी रक्षा कर लेते हैं। यही जीवित रहने का उपाय है। उन्होंने इस तरह युधिष्ठिर को बता दिया कि तुम्हें आने वाले संकट से बचने के लिए सुरंग बना लेना चाहिए।
युधिष्ठिर ने भी ठीक से समझा
विदुर जी ने युधिष्ठर को संबोधित करते हुए कहा, नेत्रहीन को रास्ता और दिशाओं का ज्ञान नहीं होता है, बिना धैर्य के समझदारी नहीं आती है। मेरी इस बात को तुम भलीभांति समझ लो। शत्रुओं के दिए हिए बिना लोहे के हथियार को जो स्वीकार करता है, वह स्याही के बिल में घुस कर आग से बच जाता है। उनका कहना था कि उस सुरंग से यदि तुम बाहर निकल जाओगे तो उस भवन की आग में जलने से बच जाओगे। नक्षत्रों से दिशा का पता लग जाता है। जिसकी पांचों इंद्रियां वश में रहती हैं, शत्रु उसकी कुछ भी हानि नहीं कर सकते हैं। अर्थात यदि तुम पांचों भाई एकमत रहोगे तो शत्रु तुम्हारा कुछ भी नहीं बिगाड़ सकेगा। विदुर का संकेत सुन कर युधिष्ठिर ने कहा, मैंने आपकी बात को भलीभांति समझ लिया है। इतना सुन विदुर हस्तिनापुर लौट आए। उस दिन फाल्गुन मास के शुक्ल पक्ष की अष्टमी तिथि और रोहिणी नक्षत्र था।