Dharma : धर्मराज युधिष्ठिर की बातें सुनकर महाराज द्रुपद को प्रसन्नता हुई। द्रुपद ने वारणावत के लाक्षाग्रह की घटना पूछी तो उन्होंने संक्षेप में सारी बातें बतायीं। द्रुपद ने धृतराष्ट्र को बुरा-भला सुनाते हुए युधिष्ठिर को आश्वस्त किया, मैं तुम्हारा राज्य तुम्हें दिलाऊंगा। तुम अर्जुन को आज्ञा दो कि वो विधिपूर्वक द्रौपदी के साथ पाणिग्रहण करो। युधिष्ठिर ने कहा, राजन ! आपकी राजकुमारी हम सबकी पटरानी होगी। हमारी माता ऐसी आज्ञा दे चुकी हैं। इसलिए आप आज्ञा दीजिए की हम सभी एक-एक करके उसका पाणिग्रहण करें।
पांच लोगों की पत्नी सुन कर चौंक गए राजा द्रुपद
युधिष्ठिर की बात सुनकर राजा द्रुपद बोले, हे कुरुवंशभूषण ! तुम यह कैसी बात कर रहे हो ? एक राजा के कई रानियां तो हो सकती हैं लेकिन एक महिला के बहुत से पति हों, ऐसा तो कभी सुनने में नहीं आया, तुम तो धर्म के मर्मज्ञ हो फिर तुम ऐसा कैसे कर सकते हो। युधिष्ठिर ने उनकी बात को धैर्य के साथ सुनने के बाद जवाब दिया, महाराज ! धर्म की गति बड़ी सूक्ष्म होती है। हम लोग तो उसे ठीक से समझते भी नहीं हैं। हम तो उसी मार्ग से चलते हैं जिससे पहले के लोग चलते रहे हैं। मेरा मन कभी भी अधर्म की ओर नहीं जाता है। मेरी माता की ऐसी आज्ञा है और मेरा मन इसे स्वीकार करता है। द्रुपद ने कहा, ठीक है पहले तुम, तुम्हारी माता और धृष्टघुम्न सब मिल कर कर्तव्य का निर्णय करें और फिर बताए। उसके अनुसार ही कल कुछ किया जाएगा।
भगवान वेदव्यास ने सभा में पहुंच कर क्या कहा
सब लोग एकत्र हो कर विचार कर रहे थे, तभी भगवान वेदव्यास जी वहां पर अचानक आ पहुंचे। सबने उठकर उनका आदर किया और उन्हें सर्वश्रेष्ठ स्वर्ण सिंहासन पर बैठाया, व्यास जी की आज्ञा से सब अपने अपने उचित स्थान पर बैठ गए तो राजा द्रुपद ने उनसे प्रश्न किया, भगवन ! एक ही स्त्री कई पुरुषों की धर्मपत्नी कैसे बन सकती है। ऐसा करने से तो संकरता का दोष होगा। व्यास जी ने कहा, राजन ! एक स्त्री के कई पति हों, यह लोकाचार और वेदों के भी विरुद्ध है। इस बारे में तुम लोगों ने क्या-क्या विचार किया है, पहले यह बताओ तब मैं अपना मत रखूंगा।