Dharma : पांडवों ने गंधर्वराज चित्रराथ की बात मान पुरोहित की तलाश की और उनकी सलाह पर उसी वन के उत्कोचक तीर्थ में देवल के छोटे भाई धौम्य ऋषि के पास पहुंचे जो वहां पर तप कर रहे थे। ऋषि ने पहले तो पांडवों का सत्कार किया। पांडवों का प्रस्ताव सुन कर उन्होंने पुरोहित बनने की स्वीकृति दी। प्रसन्न हो उन्हें प्रणाम कर पांडवों पांचाल देश की ओर द्रोपदी के स्वयंवर में शामिल होने बढ़े जिसे उनके पिता राजा द्रुपद ने आयोजित किया था। रास्ते में कुछ ब्राह्मण उन्हें मिले और उद्देश्य पूछने पर वह भी साथ चलने लगे।
पांडवों ने अपनी पहचान छिपा पांचाल में किया प्रवेश
पांचाल देश पहुंच कर उन्होंने एक कुम्हार के घर पर डेरा डाला और स्वयं भिक्षु बन कर जीवन निर्वाह करने लगे ताकि किसी को उनकी वास्तविकता न पता लग सके। इधर राजा द्रुपद के मन में इस बात की तीव्र इच्छा थी, कि उनकी पुत्री का विवाह वीर अर्जुन के साथ हो लेकिन उन्होंने अपनी इच्छा किसी से प्रकट नहीं की। इसीलिए स्वयंवर में ऐसा धनुष बनवाया जो किसी और से न झुक सके तथा आकाश में चक्कर काटता ऐसा यंत्र लटकवा दिया जिसके ऊपर के लक्ष्य को वेधना था। इसके साथ ही घोषणा कर दी कि जो वीर इस धनुष के घूमते हुए यंत्र के छेदों से तीर चला कर ऊपर रखे लक्ष्य को वेधेगा, वही उनकी पुत्री का पति होगा।
द्रोपदी के विवाह के लिए रचा स्वयंवर
राजा द्रुपद ने श्रेष्ठ राजाओं को स्वयंवर में बुलवाया था और उनके लिए यथोचित सिंहासन का प्रबंध भी किया था। उत्सव के सोलहवें दिन युधिष्ठिर आदि पांडव भी वहां ब्राह्मणों के साथ पहुंचे। द्रुपद पुत्र धृष्टघुम्न ने सजी संवरी और हाथों में वरमाला लिए द्रोपदी के बगल में खड़े होकर मधुर और गंभीर वाणी में कहा, आप लोगों के सामने धनुष और बाण है। आप लोगों को घूमते हुए यंत्र के छिद्र से अधिक से अधिक पांच बाणं से लक्ष्यवेध करना है। जो वीर बलवान और कुलीन यह कार्य करेगा वही मेरी बहन का पति होगा। धृष्टघुम्न ने धृतराष्ट्र पुत्रों और अन्य राजाओं का परिचय देते हुए मेरी प्रिय बहन इन पराक्रमी राजाओं में जो लक्ष्य को वेध दे, तुम उसके गले में माला डाल देना। उत्सव में वसुदेव नंदन बलराम, भगवान श्रीकृष्ण भी उपस्थित थे।
बड़े-बड़े वीर लक्ष्य न भेद सके
धृष्टघुम्न की बात सुनते ही वीर उठते और लक्ष्य न वेध पाने और दम फूलने पर धड़ाम-धड़ाम गिरने लगे जिससे मुकुट भी दूर जा गिरा। दुर्योधन आदि के निराश होने के बाद कर्ण ने धनुष उठाया ही था कि द्रौपदी ने कहा मैं सूत पुत्र से विवाह नहीं करूंगी। शिशुपाल ने भी कोशिश की असफल रहा। मद्रदेश के राजा शल्य की भी वही गति हुई। सभी के प्रयास कर लेने के बाद अर्जुन के मन में संकल्प हुआ कि मैं जाकर लक्ष्य को वेध दूं।