Dharma : एकचक्रा नगरी में भगवान व्यास जी पांडवों और कुन्ती से मिले तथा भावी जीवन के बारे में कुछ सलाह देकर चले गए। उनके जाते ही पांडव अपनी माता को लेकर पांचाल देश की यात्रा पर निकलने के पहले आश्रयदाता ब्राह्मण से अनुमति ली। यात्रा पर आगे बढ़ते हुए एक दिन वो लोग गंगा नदी के किनारे सोमाश्रयायण तीर्थ पहुंचे। सबसे आगे अर्जुन मशाल लिए चल रहे थे। उस तीर्थ के पास स्वच्छ एवं एकांत गंगाजल में गंधर्वराज अंगारपर्ण चित्ररथ महिलाओं के साथ विहार कर रहा था।
गंधर्वराज ने पांडवों को दी चेतावनी
गंधर्वराज चित्ररथ को कुछ लोगों के पैरों की आहट सुन कर क्रोध आया और उसने अपने धनुष की टंकार कर उन्हें चेतावनी दी कि रात्रि का समय तो गंधर्वों के लिए होता है और पूरा दिन मनुष्यों के लिए। गंधर्वराज अंगारपर्ण ने अपना परिचय देते हुए दूर रहने को खबरदार किया। उसने कहा इस समय यहां राक्षस, रुद्रगण, देवता अथवा मनुष्य कोई नहीं आ सकता है। मैं जहां चाहूं गंगा में मौज से विहार करता हूं।
अर्जुन ने जहरीले बाणों के जवाब चलाया आग्नेयास्त्र
अर्जुन ने जवाब दिया, अरे मूर्ख ! समुद्र, हिमालय की तराई और गंगानदी के स्थान रात, दिन अथवा संध्या के समय किसके लिए सुरक्षित हैं। भूखे-नंगे, अमीर-गरीब सभी के लिए रात-दिन गंगा माई का द्वार खुला रहता है। यदि मान भी लें कि तुम्हारी बात ठीक है तो हम शक्ति सम्पन्न हैं और चाहें तो बिना समय गंवाएं तुम्हे पीस सकते हैं। तुम्हारी पूजा तो कमजोर और नपुंसक लोग ही करते हैं। अर्जुन की बात सुन कर चित्ररथ ने जहरीले बाण छोड़ना शुरु कर दिया। अर्जुन ने उसके बाणों का जवाब देते हुए अपने गुरु द्रोणाचार्य द्वारा दिया हुआ आग्नेयास्त्र चलाया। आग्नेयास्त्र के प्रभाव से वह जलने लगा, अस्त्र की तेजी से वह रथ से कूद कर मुंह के बल लुढ़कने लगा तो अर्जुन ने झपटकर उसके बाल पकड़े घसीटकर अपने भाइयों के पास ले गए। गंधर्व पत्नी कुंभीनसी अपने पतिदेव की रक्षा के लिए युधिष्ठिर की शरण में आई। उसकी प्रार्थना सुन उन्होंने अर्जुन को आदेश दिया ! इस गंधर्व को छोड़ दो। अर्जुन ने उसे छोड़ते हुए कहा जाओ शोक न करो, बड़े भैया के कारण तुम्हारी जान बच गयी।
अर्जुन को सिखाई चाक्षुसी विद्या
गंधर्व ने कहा, मैं हार गया इसलिए अपना अंगारपर्ण नाम छोड़ता हूं। अर्जुन को मित्र बताते हुए कहा यह बहुत ही अच्छा हुआ कि मुझे दिव्य अस्त्रों के ज्ञाता से मित्रता करने का अवसर मिला। मैं अर्जुन को दिव्य अस्त्रों की माया सिखाना चाहता हूं। अब मैं आज से चित्ररथ से दग्धरथ हो गया। दग्धरथ ने चाक्षुसी विद्या देते हुए कहा इसकी ताकत से तुम संसार की छोटी से छोटी वस्तु को भी खुली आंखों से देख सकोगे हालांकि इस विद्या को पाने के लिए छह माह तक एक पैर पर खड़े होकर तप करना पड़ता है। इस विद्या के कारण ही गंधर्व मनुष्यों से श्रेष्ठ माने जाते हैं।