अर्जुन ने कहा हम लोग तो कुन्ती के पुत्र हैं फिर तुमने तपतीनंदन क्यों कहा। ये तपती कौन थीं ?

Dharma : द्रुपद पुत्र धृष्टघुम्न ने खुफिया तरीके से पांडवों के बारे में पता लगाकर पिता को दी जानकारी, जानिए उनका रिएक्शन

Dharma : पांडवों का पता करने पहुंचे द्रुपद पुत्र राजकुमार धृष्टघुम्न कुम्हार के घर के बाहर इतना पास में बैठे हुए थे कि सब कुछ देख और सुन सकते थे। सब कुछ देखने और समझने के बाद वे अपने महल में लौटे तब तक राजा द्रुपद का चिंता के कारण बुरा हाल था। उन्होंने धृष्टघुम्न को देखते ही पूछा, बेटा ! द्रौपदी कहां गयी, उसे ले जाने वाला युवक कौन है, वह परिवार कुलीन तो है। काश ! मेरी सौभाग्यवती पुत्री नररत्न अर्जुन को मिली होती। 

राजकुमार ने विस्तार से दी जानकारी

धृष्टघुम्न ने जवाब दिया, पिता जी ! जिस मृगचर्मधारी अति सुंदर युवक ने लक्ष्यवेध किया था, वह बहुत ही वीर और फुर्तीला है इसमें संदेह नहीं। जिस समय वह ब्राह्मणों के बीच से मेरी बहन द्रौपदी को लेकर निकला, उस समय उसके चेहरे पर कोई संकोच का भाव नहीं था। उसकी ढिठाई से उपस्थित राजा लोग जल भुन उठे और उन पर आक्रमण कर बैठे। उसके साथी पुरुष ने देखते ही देखते विशाल पेड़ को उखाड़ कर राजाओं का संहार करने लगा तो सारे भाग खड़े हुए। वे दोनोंं द्रौपदी के लेकर नगर के बाहर कुम्हार के घर पर गए जहां पर अग्नि की तरह तेजस्विनी महिला बैठी थी।  

राजा द्रुपद ने पुरोहित को परिचय जानने भेजा

धृष्टघुम्न ने अपने पिता को आंखों देखी और कानों सुनी बताते हुए कहा, पिता जी ! उस तेजस्विनी महिला के पास उस समय तीन और बहुत सुंदर युवक बैठे थे। यहां से गए दोनों युवकों ने द्रौपदी को अपनी माता के पास रखा और पांचो लोग भिक्षा लेने चले गए। मिली हुई भिक्षा से माता की आज्ञा के अनुसार देवता और ब्राह्मणों आदि को देने के बाद माता ने उन लोगों को परोसा और स्वयं भी ग्रहण किया। द्रौपदी उनके पैरों के पास सोई। सोते समय वे लोग ब्राह्मणों, वैश्यों या शूद्रों जैसी बातें न कर युद्ध से संबंधित चर्चा ही कर रहे थे, जैसा कुलीन क्षत्रीय किया करते हैं। मुझे तो लगता है कि हम लोगों की आशा पूरी हुई और अग्निदाह से बचे पांडवों ने ही मेरी बहन को प्राप्त किया है। धृष्टघुम्न की सूचना से राजा द्रुपद ने प्रसन्नता व्यक्त की और उनका वास्तविक परिचय जानने के लिए तुरंत ही राज्य पुरोहित को भेजा। 

  

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