भीमसेन और अर्जुन द्रौपदी के साथ कुम्हार के घर में घुसे तो माता कुन्ती से बोले, मां ! आज हम लोग यह भिक्षा लाए हैं।

Dharma : स्वयंवर में लक्ष्यवेध कर द्रौपदी को जीतने के बाद घर आने पर माता क्या बोलीं और युधिष्ठिर ने कौन सा निर्णय सुनाया 

Dharma : भीमसेन और अर्जुन द्रौपदी के साथ कुम्हार के घर में घुसे तो माता कुन्ती से बोले, मां ! आज हम लोग यह भिक्षा लाए हैं। उस समय माता कुन्ती किसी कार्य में व्यस्त थीं तो बिना देखे ही बोल दिया, तुम पांचों भाई मिल कर उसका उपभोग करो। बाहर निकल कर जब उन्होंने देखा कि यह तो कोई साधारण भिक्षा नहीं, राजकुमारी द्रौपदी है तो उन्हें बड़ा पश्चाताप हुआ। उन्होंने द्रौपदी का हाथ पकड़ा और युधिष्ठिर के पास ले जाकर बोलीं, बेटा ! जब भीम और अर्जुन इस राजकुमारी को लेकर भीतर आए तो बिना देखे ही मैंने बोल दिया कि तुम पांचो भाई मिल कर भिक्षा का भोग करो। मैंने आज तक कभी भी झूठ नहीं बोला है। अब तुम कोई ऐसा उपाय बताओ की द्रौपदी का अधर्म न हो और मेरी बात भी झूठी साबित न हो। 

युधिष्ठिर की बात पर अर्जुन ने क्या कहा

युधिष्ठिर ने क्षण भर विचार करने के बाद माता को आश्वस्त किया और अर्जुन को बुलाकर कहा, भाई ! तुमने मर्यादा के अनुसार द्रौपदी को प्राप्त किया है। अब तुम विधि पूर्वक अग्नि प्रज्जवलित कर उसे साक्षी मान द्रौपदी का पाणिग्रहण करो। अर्जुन ने उत्तर दिया, बड़े भैया ! आप मुझे अधर्म का भागी न बनाएं। अच्छे पुरुषों ने कभी भी ऐसा नहीं किया है। पहले आप, फिर भीमसेन और उसके बाद मैं विवाह करूंगा, मेरे बाद नकुल और सहदेव। इसलिए इस राजकुमारी का विवाह तो आपके साथ ही होना चाहिए। इसके साथ ही निवेदन है कि आप अपनी बुद्धि से धर्म, यश और कीर्ति के जो हित के लिए हो वैसी ही आज्ञा दें। 

अंत में युधिष्ठिर ने सुनाया फैसला

सभी भाई अर्जुन का प्रेम और वचन सुन द्रौपदी की ओर देखने लगे, उस समय द्रौपदी भी उन्हीं लोगों की ओर देख रही थी। हर किसी के मन में द्रौपदी का सौंदर्य, माधुर्य और सुशीलता बस गयी। युधिष्ठिर ने सभी भाइयों की भाव भंगिमा और महर्षि व्यास की बात को याद कर कहा, द्रौपदी हम सब भाइयों की पत्नी होगी। इससे सभी भाइयों को प्रसन्नता हुई और मन ही मन इस बात पर विचार करने लगे।   

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