Dharma : युद्ध में हारने के बाद गंधर्व चित्ररथ ने अर्जुन से मित्रता करते हुए उन्हें तपतीनंदन कह कर संबोधित किया तो अर्जुन का प्रश्न करना स्वभाविक था। अर्जुन ने कहा हम लोग तो कुन्ती के पुत्र हैं फिर तुमने तपतीनंदन क्यों कहा। ये तपती कौन थीं जिनके कारण तुम हम लोगों को इस रूप में कह रहे हो।
क्यों पड़ा सूर्यदेव की पुत्री का नाम तपती
राजा परीक्षित को महाभारत की कथा सुनाते हुए ऋषि वैशम्पायन ने सुनाते हुए कहा कि अर्जुन के प्रश्न पर गंधर्वराज बोले, हे अर्जुन ! आकाश में सूर्य सर्वश्रेष्ठ ज्योति हैं जिनका प्रभाव स्वर्गलोक तक है। इनकी पुत्री का नाम था तपती। वो भी अपने पिता के समान ज्योतिवान थी। वो सावित्री की छोटी बहन थी और कठिन तपस्या के कारण तीनों लोकों में तपती नाम से विख्यात हुई । वैसी रूपवती कन्या देवता,असुर, अप्सरा, यक्ष आदि किसी की भी नहीं थी। सूर्यदेव को अपनी कन्या के लिए सुयोग्य वर नहीं मिल रहा था। उन्हीं दिनों पुरुवंश के राजा ऋक्ष का पुत्र संवरण बलशाली होने के साथ ही धर्मात्मा और सूर्यदेव का परम भक्त था। नियम से उनकी पूजा और उपवास करता था। सूर्य को वह एक सुयोग्य पर प्रतीत हुआ।
तपती का रूप देख बेहोश हुए राजा संवरण
एक बार संवरण शिकार खेलने पर्वतों की तराई के जंगल में गए जहां भूख से व्याकुल होकर उनका घोड़ा मर गया तो वो पैदल ही चल पड़े। एकांत में खड़ी एक अकेली कन्या को देखकर वे एकटक उसे निहारने लगे। उन्हें लगा कि जैसे सूर्य की प्रभा ही धरती पर उतर आई हो। उसे देख वे अपनी सुध-बुध खो बैठे और फिर बोले, सुंदरि ! तुम किसकी पुत्री हो और क्या नाम है। सुंदरि ने उनका जवाब तो नहीं दिया और तुरंत ही बादलों में बिजली की तरह गुम हो गयी। इधर राजा संवरण ने उसे ढूंढने की बहुत कोशिश की किंतु न मिलने पर विलाप करते हुए बेहोश हो गए।
राजा ने रखा तपती से विवाह का प्रस्ताव
राजा संवरण को धरती पर बेहोश पड़ा देख तपती वहां आई और बोली, राजन ! उठिए आप जैसे सतपुरुष को इस तरह जमीन पर नहीं पड़ा होना चाहिए। उसकी मीठी वाणी सुन राजा की बेहोशी चली गयी और वो उठ बैठे और बोले, हे सुंदरि ! मेरे प्राण तुम्हारे हाथ में हैं और मैं तुम्हारे बिना नहीं जी सकता। मुझ पर दया करो और मुझसे गंधर्व विवाह कर मुझे स्वीकार करो। तपती ने कहा, राजन ! आप जैसे राजा को पति रूप में स्वीकार करने में मुझे कोई आपत्ति नहीं है लेकिन इसके लिए आपको मेरे पिता सूर्यदेव को प्रसन्न करना होगा। विश्व वंदनीय सावित्री की छोटी बहन हूं। इतना कह कर तपती आकाश मार्ग से फिर चली गयी और राजा फिर से बेहोश हो गए।
किसके कहने पर सूर्यदेव हुए राजी
इधर राजा को ढूंढते हुए उनके मंत्री और सैनिक वहां पहुंच गए। उन्होंने कई तरह की कोशिश कर राजा की चेतना को लौटाया। होश में आने पर केवल एक मंत्री को रोक सबको लौटा दिया और आकाश की ओर मुंह कर भगवान सूर्य की आराधना करने लगे। उन्होंने मन ही मन अपने पुरोहित महर्ष वशिष्ठ की आराधना की तो वे 12 वें दिन प्रकट हुए। राजा ने अपनी बात बतायी तो महर्षि वशिष्ठ वहीं से सूर्य देव से मिलने चल दिए और उनके पास पहुंच अपना परिचय दे राजा संवरण के लिए उनकी कन्या का हाथ मांगा। सूर्यदेव तो योग्य वर की तलाश में थे ही सो उन्होंने तपती को महर्षि के साथ राजा के लिए भेज दिया। इसके बाद राजा ने विधिपूर्वक तपती के साथ विवाह किया और वहीं पर्वत पर 12 वर्षों तक विहार किया।
खुला तपतीनंदन का रहस्य
सारा राजकाज मंत्री पर रहा जिससे कुपित हो इंद्र ने उनके राज्य में वर्षा बंद कर दी। परिणामस्वरूप सूखा पड़ा और प्रजा त्राहि-त्राहि करने लगी। लोग एक दूसरे को लूटने-पीटने लगे। महर्षि ने अपनी तपस्या के प्रभाव से वहां पर वर्षा कराई और तपती-संवरण को राजधानी लेकर आए। पैदावार शुरु होने से प्रजा खुश हो गयी और फिर हजारों वर्षों तक उन्होंने वहां राज सुख का भोग गिया। गंधर्वराज चित्ररथ ने अर्जुन को बताया कि इन्हीं तपती के गर्भ से राजा कुरु का जन्म हुआ जिससे कुरुवंश चला इसी कारण मैंने आपको तपतीनंदन कहा।