इंडियन कॉउसिल ऑफ एस्ट्रोलॉजिकल साइंसेस के दीक्षांत एवं उपाधि वितरण समारोह में संत श्री स्वामी मिथिलेश नंदिनी शरण जी महाराज ने व्याख्यान देते हुए ज्योतिष के मर्म को बताया।

Jyotish : बाजारीकरण की आंधी में ज्योतिषियों को करनी होगी पवित्रता की रक्षा 

Jyotish : इंडियन  कॉउसिल ऑफ एस्ट्रोलॉजिकल साइंसेस के दीक्षांत एवं उपाधि वितरण समारोह में संत श्री स्वामी मिथिलेश नंदिनी शरण जी महाराज ने व्याख्यान देते हुए ज्योतिष के मर्म को बताया। काशी हिन्दू विश्वविद्यालय के कुलपति माननीय श्री अजित चतुर्वेदी जी विशेष आतिथि के रुप मेंं थे। संस्था के राष्ट्रीय उपाध्यक्ष श्री रमेश चिन्तक ने उनका स्वागत करते हुए उनका आभार व्यक्त किया।

ज्योतिष के वेदांग स्वरूप और उसकी मर्यादा का पालन करना अनिवार्य –

स्वामी मिथिलेश जी ने कहा कि एक अंगांगि भाव होता है और उस भाव की दृष्टि से ज्योतिष वेद का एक अंग है। आप सब अवगत हैं कि वेद पुरुष के नेत्र हैं। अनेक अंगों में एक अंग नेत्र जिसे हम नयन कहते हैं। साहित्य और काव्य शास्त्र नयन को अनेक प्रकार से परिभाषित किया गया है। आईकास संस्थान ज्योतिष शास्त्र को उसी शास्त्र की मर्यादा में स्थापित करने में सक्रिय होकर कार्य कर रहा है। कई बार शास्त्रों के संबंध में उनके अध्येताओं से अनुरूप होती है और वो लोग शास्त्र को शास्त्र की मर्यादा से नीचे भी उतार देते हैं। पूज्य स्वामी सुबोधानंद के कथन का उल्लेख करते हुए कहा कि शासन करने के लिए शास्त्र बने हैं इसलिए हम उनके अधीन हों, उन्हें अपने अधीन करने की चेष्टा न करें तभी उनका कल्याण हमको मिल सकता है।

 बाजारीकरण, आजीविका और ज्योतिष की गरिमा

जिस विषय को बाजार स्पर्श कर लेता है उसे प्रतिस्पर्धा की अंधी दौड़ का सामना करना पड़ता है। जब कोई शास्त्र या विद्या मांग और आपूर्ति के सिद्धांत पर उतरती है तो अपनी पवित्रता की रक्षा कैसे करे, इस बात की चिंता होनी चाहिए। आज हम इस बात से इनकार नहीं कर सकते हैं कि आजीविका के बड़े आयाम के रूप में फलित ज्योतिष स्थापित है और किसी इंजीनियर, बड़े डॉक्टर और डिजायनर की तरह बहुत सारे ज्योतिष पढ़े हुए लोग बड़ी फीस लेकर मिलते हैं और गिने चुने प्रश्नों का उत्तर देकर चेंबर से बाहर कर देते हैं। मैं उसके पक्ष और विपक्ष में नहीं जाऊंगा क्योंकि वह भी एक पद्धति हो सकती है और होना भी चाहिए क्योंकि मुफ्त में जीवन भर के भविष्य के कल्याण की चिंता करने वाले ज्योतिषियों को बहुत पीढ़ियों तक सीधा पर ही गुजारा करना पड़ा है। 

एक बार नाड़ी को देख कर निदान करने वाले वैद्य का कोई शुल्क रहा है, एक मकान बनाने वाले डिजायनर के लिए कोई शुल्क है, एक बार बीमार होने वाले व्यक्ति का निदान करने वाले डॉक्टर का कोई शुल्क है तो जीवन भर की चिंताओं का निदान और समाधान करने वाले ज्योतिष अध्येताओं का भी कोई मान होना ही चाहिए था। 

जब हम कहते हैं कि ज्योतिष वेद के नेत्र हैं और नेत्रों को हम नयन कहते हैं, नयन का अर्थ है चलने वाला, उसी से आनयन विद्या जैसे शब्द बने। मनुष्य की गति चरणों से होती है लेकिन चरणों को चलाने में भी नेत्रों की भूमिका होती है। हमारे कर्मों को जिधर जाना होता है, निगाहें उधर देखती है इसलिए पावों को लेकर चलने के कारण ही नेत्रों की संज्ञा चलने की होती है और जो लेकर चलते हैं वही प्राप्ति कराते हैं। तात्पर्य है कि जिस ज्योतिष शास्त्र के द्वारा वेदों की गति प्रवृत्ति घटित होती है और उसकी प्राप्तियां होती हैं उस ज्योतिष शास्त्र का मूल उद्देश्य अंगांगि भाव से वही है जो वेदों का है या उससे भिन्न है। 

स्वामी मिथिलेश जी ने कहा कि एक अंगांगि भाव होता है और उस भाव की दृष्टि से ज्योतिष वेद का एक अंग है

ज्योतिष का वास्तविक उद्देश्य — निदान से अधिक स्वीकार्यता

अब प्रश्न होता है कि क्या ज्योतिष की चरितार्थता इस बात में है कि हम जान लें कि हमारी फैक्ट्री चलेगी या नहीं, हमारी शादी अच्छी होने वाली है या नहीं, हमारा दाम्पत्य कैसा होगा, संतानें कैसी होंगी, निवेश ठीक से रिटर्न करेगा या नहीं। वास्तव में ज्योतिष इतना नहीं है, वह इससे बहुत बड़ा है। ज्योतिष की चिंताएं वस्तुतः वही चिंताएं हैं जो वेदों की हैं। वेदों की चिंताएं क्या हैं, जीवन में प्रवृत्त हुआ मनुष्य अपनी प्रवृत्तियों को लांघता हुआ निवृत्ति की सिद्धि कैसे कर ले। हमारी प्रवृत्तियां हमें निवृत्ति तक ले जाएं वे बंधन कारणी न हो जाएं। हाथ में कुछ लग जाता है तो हम साबुन से धोते हैं लेकिन बाद में साबुन को भी साफ करने के लिए पानी लगाते हैं लेकिन पानी को छुड़ाने के लिए क्या करते हैं। पानी से पानी तो नहीं छूटता इसलिए उसे स्वतः सूखने के लिए छोड़ देते हैं या कपड़े से पोछ कर सुखाते हैं। शास्त्र कहते हैं कि कुछ ऐसी चीजें हैं जिनमें मल है, साम्यता है वो चीजें चिपकती हैं। ये चीजें रजोगुण तमोगुणों की ओर ले जाती हैं किंतु कुछ चीजें सात्विकता से भरपूर होती हैं जो स्वतः छूट जाती है। इसलिए चिपकती हुई चीजों को दूसरी चीजों से छुड़ाना और फिर उन दूसरी चीजों की ओर जाना जो न छुड़ाने पर भी स्वतः ही छूट जाती हैंं। 

ज्योतिष को भाग्य बदलने का साधन नहीं, सत्य स्वीकारने का मार्ग समझें

ज्योतिष के उपभोक्ताओं के मन में एक विचित्र बात बैठ गयी है कि जो जीवन में अवांछित घटित होने वाला है, ज्योतिषी उसको बदल दे। ज्योतिषी के पास आए हुए बहुत से लोगों का किसी शास्त्र या विद्या में अनुराग नहीं होता है, वे अपने जीवन में जो अवश्यम्भावी है उसे बदलवाने के लिए वहां पर गए हैं। डॉक्टर साहब बदल सकते तो वे ज्योतिषी के पास नहीं आते। वकील साहब ने कहा कि इस मुकदमे में जीत नहीं दिखाई देती है तो वह ज्योतिषी के पास आते हैं कि जो अवश्यम्भावी है उसे बदलने का मार्ग बताइए। मजेदार बात है कि जो ज्योतिष शास्त्र है वह नक्षत्रों और ग्रहों की योजना पर काम करता है जो यह घटना अवश्यम्भावी हो कर रहे, यही तय करके बैठे हैं। जिन ग्रहों को आप समझते हैं कि ये हमारी फाइल को बदल देंगे, वास्तव में वो आपकी फाइल को प्रोसीड कराने के लिए बैठे हैं। 

उपाय, आस्था और स्वीकार्यता — शास्त्र का वास्तविक संदेश

स्वामी जी ने कहा कि यदि शनि दंडाधिकारी हैं देवताओं के और वे इतने न्यायप्रिय हैं कि अपने ही पिता से लड़ जाते हैं तो आप यह न समझिए कि किसी को तिल और काले कंबल देने से वे आपकी फाइल में चीटिंग करेंगे, वो कतई नहीं करेंगे और आपको किसी ऐसे व्यक्ति का आश्रय नहीं लेना चाहिए जो किसी पूजा से सच को छोड़ कर आपके हित के लिए प्रवृत्त होता हो। उपासना का बल हमारी करुणा, हमारी प्रार्थना पर किसी के सजग हो जाने का बल है, सही को गलत करने का बल नहीं है। 

ज्योतिष शास्त्र कभी भी वेद के मौलिक सिद्धांतों के बाहर नहीं जाता है। हमारे शरीर में कोई सूर्यनाड़ी है हमारे खगोल में कोई सूर्य ग्रह है, हमारी धरती पर कोई मंदार वृक्ष है, शास्त्र कहता है ये तीनों एक तत्व की उपस्थिति हैं जो सर्वोपरि है। आश्चर्य की बात है कि अभी तक लोग ज्योतिष में निदान पर टिके हैं समाधान पर नहीं जाना चाहते हैं। वशिष्ठ जैसे ऋषि या सप्तर्षियों की पूरी परम्परा को देखें, वे कुछ भी बदलने के लिए नहीं खड़े हैं। ज्ञान संपन्न व्यक्ति के जीवन में जो सबसे पहला गुण विकसित होता है वह है स्वीकार्य भाव, वह बहुत सारी चीजों से लड़ना बंद करता है क्योंकि वह उनकी स्वाभाविकता और मौलिकता को पहचानता है। ज्योतिष करीबी योजनाओं की प्रतिक्रिया का शास्त्र नहीं है उसको पहचानने और स्वीकारने का शास्त्र है। बहुत से लोग उसे प्रतिक्रिया का शास्त्र मानते हैं जो नहीं है। वह ज्योतिषी के पास पहुंच जाते हैं कि इसका उपाय बताइए और यहां पहुंच कर उसकी शास्त्र निष्ठा धूमिल होने लगती है, वह जादू में बदलने लगता है। हमारा आर्ष ज्ञान बहुत कुछ विश्वास के मार्ग से आया है। विचार हमारा कुछ हजार वर्ष पहले ही मलिन और शिथिल हो गया। जब परम्पराएं विचारों को छोड़ कर विश्वास में चलने लगती हैं तो वह किसी चुनौती का जवाब देने की स्थिति में नहीं रह जाती हैं क्योंकि जो कुछ हम कर रहे होते हैं वह हमें भी नहीं पता होता है कि क्यों कर रहे हैं हम तो इसलिए कर रहे हैं क्योंकि हमारे बाबा भी करते थे, हमारे पिता भी करते थे। 

ज्योतिष समाधान से अधिक जीवन दृष्टि का विज्ञान है

उन्होंने श्री राम चरित मानस का उदाहरण देते हुए कहा कि गोस्वामी जी ने लिखा कि जब ननिहाल में भरत जी को अपशकुन दिखाई पड़े तो उन्हें लगा कि कुछ अमंगल होने वाला है, अमंगल दूर करने के लिए उन्होंने शिव अभिषेक किया और अयोध्या लौटे तो पिता के निधन, बड़े भाई राम के वनगमन और उजड़ी अयोध्या मिलती है तो क्या उपचार व्यर्थ हो गया। जब इस पूजन का फल देखने चलेंगे तो आपको लगेगा कि जिस वातावरण में अयोध्या विक्षिप्त और किंकर्तव्यविमूढ़ हो गयी है, जिस विपत्ति में गुरुदेव वशिष्ठ बिलख कर कहते हैं कि मेरे हाथ में कुछ नहीं है। उसी विपत्ति का सबसे बड़ा उपभोक्ता कहता है कि मुझे एक मार्ग दिखाई पड़ रहा है कि श्री राम के पीछे जाना चाहिए और स्थिति यह बनती है गुरु अपने शिष्य भरत के पीछे चल देते हैं। 

ये उपचार फलित हो रहा है, क्रिया तो अपना फल देती ही है, कई बार फल वहां नहीं दिखाई पड़ता है जहां हम देखना चाहते हैं लेकिन कर्म का फल तो मिलता ही है। ज्योतिष के एक फल को देखने के लिए सात आठ फलक होते हैं कोई कहता है राशि के आधार पर तो कोई लग्न और कोई प्रश्न के आधार पर अनुसंधान करता है। प्रत्येक ज्योतिषी अपनी-अपनी प्रवृत्ति के आधार पर उसी कुंडली से निष्कर्ष निकालता है क्योंकि ज्योतिषी की अपनी भी कोई कुंडली होती है जो प्रवृत्त होती है। 

उन्होंने कहा कि कुछ लोग मोबाइल पर हर समय कुंडली लेकर चलते हैं, ऐसे लोगों को ज्योतिषी की नहीं मनोचिकित्सक की आवश्यकता है। हमें समझना होगा कि जब हम अंधेरे में टार्च लेकर चलते हैं तो जिस तरफ आप टार्च से देखते हैं उसके आसपास ज्यादा अंधेरा हो जाता है। जब आप किसी एक इच्छा, कामना की दिशा में ज्योतिषीय टार्च लेकर देखना शुरु करते हैं तो जीवन के दूसरे बहुत सारे मानवीय पक्ष छूट जाते हैं। संशयग्रस्त धुंधले फलादेश के कारण हम अब तक जिए जा रहे जो मानवीय आचरण में बदलाव करते हैं वो हमें विपथगामी बना देते हैं। भविष्य की आशंकाओं से अपने वर्तमान का आचरण मलिन न करें क्योंकि ज्योतिष इसके लिए प्रेरित नहीं करता है। हम अपनी हर चीज को विज्ञान से लाइसेंस देना चाहते हैं जो भ्रम है। विज्ञान शब्द वस्तुतः धर्म ने दिया है, हम भारतीय भाषान्तर में साइंस को विज्ञान कहते हैं और वो विज्ञान को साइंस कहते होंगे। जिसे हम धर्म कहते हैं उसमें विज्ञान की भूमिका वो है जो हमारे पंजे की अंगुलियों में नाखून की है। ये गिर जाएं तो बहुत पीड़ा होती है और ये बढ़ते रहते हैं तो हम काट भी देते हैं उसी तरह जीवन में विज्ञान बढ़ता जा रहा है लेकिन इन्हें हमें उतना ही पहचाना है जितना पंजे में नाखून है। 

विज्ञान, आध्यात्मिकता और अप्रमेय सत्ता की ओर उन्मुख ज्योतिष

श्री मद्भगवदगीता में कहा गया है कि ज्ञान से आगे है विज्ञान और उससे भी आगे है आस्तिकता। बदलते हुए पदार्थों को पदार्थ मान लेने के कारण चेतना की ऊपर की जो अवस्था है वह कहती है इनका कोई अचिन्त्य नियामक है जो सब पर नियंत्रण रखता है और वह हमारी तरह नहीं है कि अपना टैग लगा दें। परमसत्ता अपना नाम नहीं छोड़ती क्योंकि वह जानती है कि दूसरा कोई क्लेम करने वाला है नहीं इसलिए नाम क्यों लिखना। ये वस्तु मेरी है तब कहना पड़ता है जब कोई दूसरा भी उपस्थित हो जो कह सकता है कि यह मेरी है। इसीलिए परमात्मा ने पूरे ब्रह्मांड में न कहीं ओंकार लिख कर छोड़ा न कहीं कोई सिग्नेचर किया क्योंकि उन्हें कोई चैलेंज करने वाला नहीं है। सुई बनाने वाला भी अपनी स्टैंप लगा देता है लेकिन परमसत्ता ने ऐसा नहीं किया क्योंकि यह संपूर्ण ब्रह्मांड उसी का है। जब हम ज्योतिष विज्ञान के माध्यम अनुसंधान के लिए उस ब्रह्मांड में जाते हैं तो कहते हैं कि उस सत्ता को पहचान पाना, इन सबके ऊपर कोई नियामक सत्ता है जो हमारे पहचान से ऊपर है। एक प्रमेय जगत है और एक अप्रमेय ईश्वर है, जब हम प्रार्थना करते हैं तो अप्रमेय शब्द का व्यवहार करते हैं लेकिन क्या कभी किसी ने इसे समझा है। जगत प्रमेय है जिसकी सत्ता सिद्ध नहीं होती और प्रमाणों से इसे सिद्ध किया जाता है किंतु अप्रमेय सत्ता भी होती है जो स्वतः सिद्ध सत्ता है और जिसको सिद्ध करने के लिए किसी प्रमाण की आवश्यकता नहीं होती। सुंदर, विद्वान और बलवान कहने के लिए तो आपको प्रमाण की आवश्यकता है लेकिन किसी भी काल में मयपन को जानने के लिए प्रमाण की आवश्यकता नहीं है क्योंकि आत्मा स्वतःसिद्ध सत्ता है और वह अप्रमेय है। ज्योतिष केवल प्रमेय जगत के लिए नहीं बल्कि इस देह से प्रमेय जगत को पार कर अप्रमेय सत्ता तक ले जाने का कार्य करता है। ज्योतिष हमारा चश्मा नहीं है वह वेद पुरुष का नेत्र है। जब आप ज्योतिष से देखेंगे तो वह दिखना चाहिए जो वेद दिखाते हैं।             

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