Dharma : धृतराष्ट्र को द्रौपदी का पांडवों के साथ विवाह का समाचार देकर जब विदुर जी चले गए तो दुर्योधन और कर्ण ने उनके पास पहुंच कर कहा, महाराज ! हम लोग विदुर के सामने तो कुछ नहीं कह पाए लेकिन आप उनके सामने शत्रुओं की प्रगति को अपनी प्रगति मान कर हर्ष क्यों प्रकट कर रहे थे। हमें तो रात-दिन शत्रुओं के नाश की धुन में लगे रहना चाहिए। हमें अभी से ऐसा उपाय करना सकें। चाहिए जिससे वे आगे चल कर हमारी राज्य संपत्ति न हथिया
धृतराष्ट्र ने पुत्र दुर्योधन से जानी उसकी मंशा
धृतराष्ट्र ने कहा, बेटा ! चाहता तो मैं भी यही हूं किंतु विदुर के सामने वाणी तो क्या चेहरे से भी मेरा भाव व्यक्त नहीं होना चाहिए। कहीं वह मेरे भाव को न भांप ले इसलिए मैंने उसके सामने किसी तरह का भाव नहीं व्यक्त किया बल्कि पांडवों के गुणों का बखान किया। तुम दोनों इस समय जो करना उचित समझते हो, खुल कर बताओ। दुर्योधन ने कहा, पिताजी ! मेरा तो विचार है कि कुछ गुप्तचरों और चतुर ब्राह्मणों को भेजकर कुन्ती और माद्री के पुत्रों के बीच मनुमुटाव पैदा करा दिया जाए या फिर राजा द्रुपद, उनके पुत्र और मंत्रियों को लालच देकर पांडवों को उनके यहां से निकलवाने का प्रयास किया जाए। यदि किसी तरह धोखा देकर भीमसेन को मारने की सफलता मिल जाए तो फिर सारा काम ही बन जाएगा।
दुर्योधन फिर से साजिश की बात सोचने लगा
दुर्योधन ने कहा, भीमसेन के बिना अर्जुन तो हमारे कर्ण का चौथाई भी नहीं है। यदि ये उपाय आपको न जंचे तो कर्ण को उनके पास भेज दीजिए, जब लो लोग कर्ण के साथ यहां आ जाएंगे तो फिर पहले की तरह कोई न कोई उपाय निकाल लिया जाएगा और इस बार वो किसी भी तरह से नहीं बच पाएंगे। द्रुपद का पूरा विश्वास और सहानुभूति प्राप्त करने के पहले ही उन्हें मार डालना चाहिए। मेरी तो यही राय है बाकी कर्ण भी अपनी राय देगा। कर्ण ने कहा, दुर्योधन मैं तुम्हारी राय को पसंद नहीं करता क्योंकि तुम्हारे बताए उपायों से पांडवों को वश में होना संभव नहीं दिखता। वे आपस में इतना अधिक प्रेम करते हैं कि मनमुटाव होने की कोई संभावना नहीं है।