ब्राह्मणों के जवाब को सुन अर्जुन ने मुस्कुराकर कहा, ब्राह्मणों ! आप लोग एक ओर खड़े होकर तमाशा देखिए, इन लोगों के लिए तो मैं ही बहुत हूं।

Dharma : ब्राह्मण वेश धारी अर्जुन के लक्ष्य वेधते ही स्वयंवर में उपस्थित राजा महाराज द्रुपद को मारने दौड़े, जानिए किसने लिया उनसे मोर्चा

Dharma : पांचाल देश में लक्ष्य वेध करने के बाद जैसे ही राजा द्रुपद की पुत्री द्रौपदी ने ब्राह्मण वेशधारी अर्जुन के गले वरमाला डाली, स्वयंवर मंडप में उपस्थित राजाओं ने अर्जुन को तो ब्राह्मण समझ छोड़ दिया लेकिन सब राजा द्रुपद को मारने दौड़े। राजाओं का क्रोध देख द्रुपद भी डर गए और ब्राह्मणों की शरण में गए। उन्हें भयभीत देख अर्जुन और भीम भी आ गए। ब्राह्मणों ने अपना कमंडल हिलाते हुए द्रुपद से कहा, डरना नहीं हम तुम्हारे शत्रुओं से लड़ेंगे।  

अर्जुन बोले, इनके लिए तो मैं ही काफी हूं

ब्राह्मणों के जवाब को सुन अर्जुन ने मुस्कुराकर कहा, ब्राह्मणों ! आप लोग एक ओर खड़े होकर तमाशा देखिए, इन लोगों के लिए तो मैं ही बहुत हूं। मारने के लिए आने वालों में कर्ण भी थे, अर्जुन ने अपने धनुष से बाण चलाए कि वो युद्धभूमि में अचेत होकर गिर पड़े। कर्ण खड़े हुए और दोनों वीर एक दूसरे से जीतने की इच्छा से अपने हाथों की सफाई दिखाने लगे। कर्ण ने कहा, आप ब्राह्मण होकर भी धनुर्विद्या में कुश है, कहीं आप धनुर्वेद या परशुराम तो नहीं हैं। मुझे तो ऐसा जान पड़ता है मानों विष्णु या इंद्र अपने को छिपाकर मुझसे युद्ध कर रहे हैं। यदि मैं क्रोध मे भरकर युद्ध करूं तो देवराज इंद्र और पांडुनन्दन अर्जुन के अलावा अन्य कोई मेरा सामना नहीं कर सकता है। 

कर्ण पीछे हटे, भीम से भिड़े शल्य

कर्ण की बात सुन अर्जुन बोले, हे कर्ण ! मैं धनुर्वेद या परशुराम नहीं हूं। मैं तो समस्त शास्त्रों का रहस्यज्ञ एक श्रेष्ठ ब्राह्मण योद्धा हूं। गुरुदेव के प्रताप से मुझे ब्रह्मास्त्र और इंद्रास्त्र का अच्छा अभ्यास है। मैं तुम्हें जीतने के लिए तुम्हारे सामने खड़ा हूं, तुम अपना जोर आजमाओ। महारथी कर्ण ने प्रतिद्वन्दी के अजेय मान युद्ध से स्वयं को हटा लिया। जब कर्ण और अर्जुन युद्ध कर रहे थे, तभी दूसरे स्थान पर शल्य और भीमसेन एक दूसरे को ललकार मतवाले हाथियों की तरह युद्ध करने लगे। दो घड़ी तक को भयंकर युद्ध हुआ लेकिन उसके बाद ही भीमसेन ने शल्य को जमीन पर पटक दिया। यह दृश्य देख सभी ब्राह्मण हंसने लगे। भीम चाहते तो शल्य को मार भी सकते थे किंतु उनके ऐसा न करने से सब आश्चर्य करने लगे। 

अर्जुन और भीमसेन द्रौपदी संग पहुंचे घर

कर्ण के पीछे हटने और शल्य के हारने से युद्ध समाप्त हो गया। स्वयंवर मंडप में उपस्थित श्री कृष्ण तो अर्जुन को पहचान गए और आगे आकर सभी राजाओं को नम्रता पूर्वक समझाया, इस व्यक्ति ने द्रौपदी को धर्म के अनुसार प्राप्त किया है इसलिए युद्ध करना उचित नहीं। राजाओं के वापस जाने पर दोनों द्रौपदी को लेकर अपने निवास कुम्हार के घर की ओर चल पड़े। भिक्षा लेकर लौटने का समय बीत चुका था। माता कुन्ती पुत्रों के समय से न लौटने पर चिंतित हो रही थीं तभी भीमसेन और अर्जुन द्रौपदी संग आ गए।    

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