युधिष्ठिर ने कहा कि यदि अन्य भाइयों को आपत्ति न हो तो हमें वहां जाने में कोई बुराई नहीं है।

Dharma : जानिए पांडवों को किसने बतायी द्रौपदी के पूर्व जन्म की कथा और क्या सलाह दी

Dharma : एकचक्रा नगरी के जिस ब्राह्मण परिवार में पांडव अपनी मां के साथ रुके थे, वहां पधारे एक सदाचारी ब्राह्मण से राजा द्रुपद के पुत्र धृष्टघुम्न और पुत्री द्रौपदी के जन्म और अब स्वयंवर की बात सुनने के बाद पांडव बेचैन से हो गए उनकी दशा समझ मां कुन्ती ने अपने पांचों पुत्रों को बुलाया और कहा कि इस परिवार में रहते हुए हम लोगों को पर्याप्त समय हो गया है। अब हमें कहीं और प्रस्थान करना चाहिए, तुम लोगों की इच्छा हो तो हमें पांचाल देश चलना चाहिए। युधिष्ठिर ने कहा कि यदि अन्य भाइयों को आपत्ति न हो तो हमें वहां जाने में कोई बुराई नहीं है। सभी ने हां की तो ब्राह्मण परिवार को धन्यवाद दे वहां से प्रस्थान की तैयारी शुरु की। 

पांडवों से मिलने पहुंचे व्यास जी

जिस समय पांडव निकलने की तैयारी कर रहे थे, उसी समय वहां पर श्री कृष्ण द्वैपायन व्यास जी एकचक्रा नगरी में उन लोगों से मिलने पहुंचे। सबने उन्हें हाथ जोड़ प्रणाम किया। व्यास जी ने एकांत में जाकर पांडवों द्वारा किया सत्कार स्वीकार किया। उन्होंने पांडवों से धर्म, सदाचार, शस्त्रों की आज्ञा का पालन, पूज्य एवं ब्राह्मण पूजा आदि के बारे में पूछ कर धर्मनीति और अर्थनीति का उपदेश दिया।  

द्रौपदी को वरदान की कथा

इसके बाद उन्होंने प्रसंगवश एक कथा सुनाई, हे पांडवों ! पुराने समय की बात है एक महात्मा ऋषि की बहुत ही सुंदर और गुणवती कन्या थी। रूप गुण और सदाचारी होने के बाद भी पूर्व जन्मों के कर्मों के कारण कोई भी उसे पत्नी के रूप में स्वीकार नहीं कर रहा था। दुखी होकर वह तपस्या करने लगी। उसकी तपस्या से प्रसन्न हो शिव जी प्रकट हो कर बोले, हे कन्या ! तू मुंहमांगा वर मांग ले। कन्या ने कहा, मुझे सर्वगुण सम्पन्न पति चाहिए। भगवान शंकर ने कहा, तुझे पांच भरतवंशी पति प्राप्त होंगे। कन्या बोली मैंने तो आपसे एक ही वर की मांग की है। भगवान बोले, तूने पति प्राप्त करने के लिए मुझसे पांच बार प्रार्थना की है। इसलिए तुझे अगले जन्म में पांच पति प्राप्त होंगे, मेरी बात गलत नहीं हो सकती है। हे पांडवों ! वही देवरूपिणी कन्या राजा द्रुपद की यज्ञवेदी से प्रकट हुई है। तुम लोगों के लिए विधि विधान के अनुसार वही सर्वगुण सम्पन्न कन्या निश्चित हुई है। तुम लोग जा कर पांचाल नगर में रहो और उसे पाकर सुखी हो। इतना कह कर व्यास जी ने वहां से प्रस्थान किया। 

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