वारणावत में युधिष्ठिर अपनी माता और भाइयों के साथ पहुंचे तो वहां के नागरिकों ने सबका खूब आदर सत्कार किया। करीब 10 दिनों तक रहने के बाद दुर्योधन के दूत पुरोचन ने पांडवों से उस भवन की चर्चा की जो खास तौर पर उनके लिए ही बनवाया गया था। उस भवन की पुरोचन द्वारा तारीफ करने पर पांडव अपने सामान के साथ वहां रहने को चले गए। अंदर पहुंच कर युधिष्ठिर ने भवन का निरीक्षण करते हुए भीमसेन से कहा, भाई भीम ! देखते हो न, घर का हर कोना आग भड़काने वाली चीजों से बना है। इसे घी, लाख और चर्बी आदि से मिलाकर बनाया गया है। शत्रु के कारीगरों ने बड़ी ही चतुराई से दीवारों में राल, मूंज, घास और बांस आदि का इस्तेमाल किया है। निश्चय ही पुरोचन का विचार है कि जब हम लोग यहां बेखटक रहने लगें तो वह आग लगाकर हम सबको जला दे। विदुर जी समझ गए थे इसीलिए उन्होंने मुझे संकेत कर दिया था इसलिए हम लोगों को बहुत सी सावधानी से इस जानकारी से अनजाने बन कर रहना होगा। हमें क्रोध से नहीं समझदारी से काम लेना होगा।
माता संग पांडव रहने लगे लाक्षागृह में
सब सावधानी के साथ वहां रहते रहे, एक दिन विदुर का विश्वासपात्र पांडवों के पास आकर धीमे से बोला, मुझे खोदाई का काम बहुत अच्छे से आता है। विदुर जी की आज्ञा से मैं आपके पास आया हूं, विदुर जी ने विदेशी भाषा में आपको संकेत किया था और उनके अनुसार आप समझ भी गए थे। उस पर विश्वास कर युधिष्ठिर ने कहा भाई इस आने वाले खतरे से बचाने का तुम उपाय करो। खाई की सफाई करने के नाम पर वह उसी भवन में टिक गया और घर के बीचो बीच से उसने बड़ी लंबी सुरंग बनाई और मुंह हमेशा इसलिए बंद रखा कि कही पुरोचन आकर न देख ले। पांडव सावधानी से दिन भर शिकार के बहाने बाहर निकलते और रात में भवन में सावधानी से रहते।
पुरोचन की योजना के पहले ही सब तय हो गया
करीब साल भर बाद पुरोचन अपनी योजना का क्रियान्वयन करने का विचार करने लगा। उसकी प्रसन्नता देख युधिष्ठिर ने भाइयों से कहा, पुरोचन समझ रहा है कि हम लोग उसके भुलावे में आ चुके हैं। इसलिए अब हम लोगों को यहां से निकल कर भवन में आग लगा देना चाहिए। एक दिन कुन्ती ने दान के लिए ब्राह्मणों को बुलाया, बहुत ही महिलाएं भी आईं। सब खाकर चले गए तभी संयोग से एक भील महिला अपने पांच पुत्रों के साथ भोजन करने आई। वे सब शराब पीकर मस्त थे, इसलिए बेहोश होकर लाक्षागृह में ही सो गए। चारो ओर भयंकर अंधेरा था, भीमसेन वहां पहुंचे जहां पुरोचन सो रहा था, भीम ने उस मकान के दरवाजे पर आग लगायी और लपटें उठने लगीं तो दौड़ कर अपने भवन में आए।
आग की लपटों में राख हो गया लाक्षागृह
पांचों भाई अपनी माता के साथ पहले से बनी सुरंग में घुस कर चलने लगे। इधर पूरे भवन में आग लगने से वहां के आसपास के लोग जाग गए और आग को बचाने की कोशिश में लग गए लेकिन आग की लपटें और भी तेज हो गयीं। सब दुर्योधन और महाराज ध्रतराष्ट्र की करतूत समझ कर धिक्कारने लगे कि यह उन्हीं की साजिश है। पांडव माता कुन्ती को साथ ले सुरंग से होते हुए एक जंगल में निकले। सबको थका देख भीम ने अपनी माता को कंधे और नकुल सहदेव को गोद में बैठाया तथा युधिष्ठिर और अर्जुन को सहारा देते हुए जल्दी जल्दी चलते हुए गंगा जी के तट पर पहुंचे और चैन की सांस ली।