राजर्षि उत्सुक और माता पुष्करिणी ने भगवान की तपस्या कर अंग जैसा पुत्र प्राप्त किया, जो शील स्वभाव, साधुता, ब्रह्मण्यता आदि तमाम गुण वाले थे।

Shri Bhaktamal : श्री अंग जी की कथा

Shri Bhaktamal : ध्रुव जी के वंश में राजर्षि उत्सुक और माता पुष्करिणी ने भगवान की तपस्या कर अंग जैसा पुत्र प्राप्त किया, जो शील स्वभाव, साधुता, ब्रह्मण्यता आदि तमाम गुण वाले थे। राजर्षि उत्सुक के बाद राज्य की बागडोर अंग के पास आई और वे राजर्षि अंग कहलाए। एक बार वो अश्वमेध यज्ञ करा रहे थे, नियमतः यज्ञ आदि अनुष्ठान करने पर देवता यज्ञ से अपना भाग लेने आते हैं किंतु उनके यज्ञ में एक भी देवता नहीं आए तो ऋषियों सहित राजर्षि को चिंता हुई। 

राजा अंग के पूछने पर ऋषियों ने कहा इस जन्म में तो आपने कोई ऐसा कार्य नहीं किया है कि देवता अपना भाग लेने न आएं, हो सकता है कि आपने पूर्व जन्म में कोई ऐसा कर्म किया हो जिसके कारण आप अभी तक पुत्रहीन हैं। उन्होंने कहा राजन ! आप पुत्र की कामना से पुत्रेष्टि यज्ञ करिए तो मुझे विश्वास है कि देवता अपना भाग भी लेंगे और आपको पुत्र रत्न की प्राप्ति भी होगी।

ऋषियों ने यज्ञ की पूर्णाहुति राजा से दिलायी, अग्निकुंड से एक दिव्य पुरुष सोने के पात्र में खीर लिए प्रकट हुए। राजा ने उस पात्र को स्वयं सूंघ कर अपनी पत्नी को दे दिया। रानी ने उस खीर को खाने के साथ ही गर्भ धारण किया और उचित समय पर पुत्र को जन्म दिया। राजा अंग की पत्नी का नाम सुनीथा था और वो मृत्यु की कन्या थीं। राजा अंग का पुत्र बेन भी अपने नाना के गुणों को लेकर जन्मा था और जिस पशु-पक्षी या मनुष्य को देख कर हंस देता, तत्काल उसकी मृत्यु हो जाती थी। वह जिधर भी जाता लोग उसे देख चिल्ला कर भागने लगते की मौत आई। महाराज अंग ने उसे बहुत समझाने का प्रयास किया किंतु सब कुछ व्यर्थ रहा। प्रजा उससे त्रस्त रहने लगी। सारी स्थितियों को देख राजा अंग को अपार दुख हुआ। वे मन ही मन सोचने लगे कि जिन गृहस्थों के पुत्र नहीं हैं उन्होंने निश्चित रूप से पूर्व जन्म में श्री हरि की आराधना की होगी। इसी कारण कपूत के कारण मिलने वाले क्लेश नहीं भोगने पड़ते हैं।

इसके बाद वे सोचने लगे कि मैं तो सपूत की अपेक्षा कपूत को ही अच्छा समझता हूं क्योंकि सपूत को छोड़ने में बड़ा क्लेश होता है किंतु कपूत तो घर को नरक बना डालता है इसलिए उससे सहज ही छुटकारा मिल जाता है। यह विचार मन में आते ही राजा अंग का मन संसार से विरत हो गया और रात के अंधेरे में घर छोड़ कर निकल पड़े। प्रजाजनों, पुरोहित, मंत्री आदि ने उन्हें खोजने का बहुत प्रयास किया किंतु कहीं नहीं मिले क्योंकि वे तो भगवान का भजन करते हुए वैकुण्ठ पहुंच गए थे।      

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