नैमिषारण्य में जो 88 हजार ब्रह्मवादी ऋषि रहते थे, उनके प्रधान थे श्री शौनक जी। भृगुवंशी शुनक जी के पुत्र होने के नाते उनका नाम शौनक पड़ा।

Shri Bhaktamal : श्री शौनक जी की कथा

Shri Bhaktamal : नैमिषारण्य में जो 88 हजार ब्रह्मवादी ऋषि रहते थे, उनके प्रधान थे श्री शौनक जी। भृगुवंशी शुनक जी के पुत्र होने के नाते उनका नाम शौनक पड़ा। सभी पुराणों और महाभारत को सूत जी के मुख से इन्होंने ने ही सुना था। पुराणों को सुनने वाला ऐसा कौन सा मनुष्य होगा जो इनके नाम को न जानता हो। समस्त पुराणों में इसीलिए सबसे पहले “शौनक उवाच” शब्द आता है। दरअसल इन पुराणों में हिन्दू समाज में किए जाने वाले व्रतों का महात्म्य और तीर्थों की महिमा बतायी गयी है और यह सब आज भी लोग पढ़ या सुन पा रहे हैं उसका श्रेय शौनक जी को ही जाता है। 

उनका पूरा समय भगवत्कथा को सुनने में ही बीतता था। श्री भक्तमाल के अनुसार ऋषियों में जैसा विशुद्ध और संयमयुक्त चरित्र महर्षि शौनक का मिलता है, वैसा अन्य किसी ऋषि में शायद ही हो। ये नियम हवन आदि नित्य कर्म करने के बाद भगवान की कथा सुनने के लिए बैठ जाते थे और फिर पूरा दिन उनकी कथा सुनने में ही बिताते थे। यहां तक कि इस दौरान उन्हें भूख प्यास की चिंता भी नहीं रहती थी। इस तरह शौनक जी समाज को इस बात की शिक्षा भी देते हैं कि लोगों को पुराणों को किस तरह सुनना चाहिए। 

वे ये भी बताते हैं कि भगवान का चरित्र सुनने के बाद उसे इस किस तरह जीवन में अपनाना चाहिए और कथा में किस प्रकार की एकाग्रता रहनी चाहए। वे समय के सदुपयोग का भी संदेश देते हैं। उनका पूरा जीवन अनुकरणीय है।

Leave a Reply