Shri Bhaktamal : ब्रह्मा जी के मानस पुत्र स्वायमभुव मनु के पुत्र प्रियव्रत जी जन्म से ही भगवान के परम भक्त थे। देवर्षि नारद की कृपा से उन्होंने परमार्थतत्व को जान लिया था। वे गंधमादन पर्वत पर रहते हुए नारद जी से भगवान की लीलाओं को सुन आनंद की अनुभूति करते।
“श्री भक्तमाल” ग्रन्थ में हरि ध्यान निष्ठ भक्तों की श्रेणी में उनका नाम भी है। प्रियव्रत के पिता स्वायम्भुव मनु ने जब उन्हें राजकाज संभालने के लिए बुलाया तो उन्होंने इनकार कर दिया। इस बर ब्रह्मा जी उन्हें समझाने उनके पास पहुंचे तो नारद जी के साथ वे भी खड़े हो गए और उनका पूजन किया। उन्होंने कहा, बेटा प्रियव्रत ! सर्वेश्वर प्रभु ने जो कर्तव्य तुम्हें सौंपा है, तुम उसका पालन करो। मैं स्वयं, शिव जी, सभी महर्षि उन प्रभु के आदेश का पालन करते हैं। इस लिए भगवान के दिए हुए भोगों को भोगो और आसक्ति रहित हो कर प्रजा का पालन करो। प्रियव्रत जी ने उनके आदेश का पालन करने के लिए राजधानी में आए और राज्य तथा गृहस्थधर्म स्वीकार किया। प्रजापति विश्वकर्मा जी की पुत्री बर्हिष्मती से उन्होंने विवाह किया जिससे उनके दस पुत्र और एक कन्या हुई।
प्रियव्रत संपूर्ण ब्रह्मांड के स्वामी थे। उन्हें यह अच्छा नहीं लगता था कि आधी पृथ्वी पर एक समय दिन और आधी पर रात में रहें। रात को भी दिन बनाने की धुन में वे प्रकाश बिखेरने वाले एक ऐसे दिव्य रथ पर सवार हुए जो सूर्य की गति के समान ही वेग से रात्रि वाले भाग में यात्रा करने लगे। इस तरह सातों दिन और रात घूमने रहते और उतने ही काल उन्होंने भूमंडल पर दिन के समान प्रकाश बनाए रखा। ब्रह्मा जी ने इस कार्य के लिए उन्हें रोका। उनके रथ के पहियों से सात समुद्र बन गए। उन समुद्रों से घिरे हुए द्वीप अपने पुत्र आग्नीध्र को जम्बूद्वीप, इध्मजिह्व को प्लक्षद्वीप, यज्ञबाहु को शाल्मलिद्वीप, हिरण्यरेता को कुशद्वीप, घृतपृष्ठ को क्रौचद्वीप, मेधातिथि को शाकद्वीप और वीतिहोत्र को पुष्करद्वीप का अधिपति बना दिया जबकि उनके तीन पुत्र कवि, महावीर और सवन आजन्म ब्रह्मचारी, आत्मवेत्ता परमहंस हो गए।
इतना बड़ा साम्राज्य और समस्त लोकों के लोकपाल मित्र होने के बाद भी भगवान के परम भक्त प्रियव्रत को इन सबसे तनिक भी मोह नहीं था। उन्हें लगता था व्यर्थ ही मैंने यह प्रपंच बढ़ाया है। पुत्रों को सम्पूर्ण साम्राज्य सौंप ऐश्वर्य आदि का त्याग कर वे गंधमादन पर्वत पर महर्षि नारद के पास पहुंचे और भगवान का चिंतन ही व्रत बना लिया। हर ओर चर्चा होने लगी कि भगवान का अनन्य भक्त ही ऐसा त्याग कर सकता है।