मदालसा एक ऐसी विद्वान, विदुषी महिला थीं, जिन्हें अपने पुत्रों का ही नहीं पति का भी उद्धार किया।

Shri Bhaktamal : श्री मदालसा जी की कथा

Shri Bhaktamal : मदालसा एक ऐसी विद्वान, विदुषी महिला थीं, जिन्हें अपने पुत्रों का ही नहीं पति का भी उद्धार किया। पहले वे गंधर्वराज विश्वावसु की पुत्री थीं फिर नागराज अश्वतर की कन्या के रूप में प्रकट हुईं। 

प्राचीन काल में शत्रुजित नाम के धर्मात्मा राजा थे जिनकी राजधानी गोमती नदी के तट पर थी। उनका एक बुद्धिमान साहसी और सुंदर पुत्र भी था जिसका नाम था ऋतध्वज। एक दिन नैमिषारण्य से गालवमुनि एक सफेद घोड़े के साथ महाराजा शत्रुजित के दरबार में पधारे और बोले, राजन ! हम आपके राज्य में रहकर तप और भगवान का भजन करते हैं किंतु एक दैत्य यज्ञ आदि में बाधा डालता है, आपसे निवेदन है कि आप उसे दंड दें। उन्होंने आगे बताया कि जब दैत्य को रोकने का उपाय कर रहे थे, तभी यह दिव्य घोड़ा आकाश से नीचे उतरा और आकाशवाणी हुई, मुने ! यह घोड़ा बिना रुके पूरी पृथ्वी की परिक्रमा कर सकता है और आसानी से कहीं भी जा सकता है इसलिए इसका नाम कुवलय है। सूर्यदेव ने यह घोड़ा आपको समर्पित कर मुझे आज्ञा दी कि इसे उनके पुत्र ऋतध्वज को देकर दैत्य का वध करने का आग्रह करें। इस घोड़े के कारण ऋतध्वज की प्रसिद्धि होगी और वे कुवलयाश्व कहलाएंगे। इस आकाशवाणी के आधार पर ही हम आपके पास आए हैं। 

मुनि के कहने पर महाराजा ने अपने पुत्र ऋतध्वज को दैत्य को मारने के लिए भेजा। महाराज शत्रुजित की मृत्यु बाद ऋतध्वज राजा बने और उनका मदालसा के साथ विवाह हुआ। मदालसा से उनके तीन पुत्र हुए और उन्होंने उनका नाम क्रमशः विक्रान्ता, सुबाहु और शत्रुमर्दन रखा। नामकरण के समय मदालसा हंस देती थी। बच्चों को लोरियां सुनाने के स्थान पर वह आत्मज्ञान का उपदेश देती। चौधे पुत्र का जन्म होने पर राजा की नजर मदालसा पर पड़ी तो उन्होंने कहा इस पुत्र का नाम तुम ही रखो। उनकी आज्ञा मान कर मदालसा ने उसका नाम अलर्क रखा। नाम रखने पर राजा ने उसका अर्थ पूछा तो मदालता ने उत्तर दिया, नाम से आत्मा का कोई संबंध नहीं है। संसार का व्यवहार चलाने के लिए कोई भी नाम कल्पना कर रख लिया जाता है। आपने जो भी नाम रखे वे निरर्थक हैं। राजा उसके जवाब से निरुत्तर हो गए लेकिन जब वह अलर्क को भी आत्मज्ञान का उपदेश देने लगी तो राजा ने टोका कि इसे तो वंश परम्परा को आगे बढ़ाने के मार्ग पर लगाओ। पति की आज्ञा मान मदालसा न उसे धर्म अर्थ और काम, तीनों ही शास्त्रों में पारंगत बना दिया। बड़ा होने पर माता पिता ने अलर्क को राजगद्दी पर बिठाया और ऋतध्वज तथा मदालसा वन में तपस्या करने चल पड़े। चलते समय मदालसा ने अलर्क को एक अंगूठी देते हुए कहा जब कोई संकट हो तो इसके भीतर लिखे उपदेश पत्र को निकाल कर पढ़ लेना। अलर्क ने बड़े होने पर गंगा यमुना के संगम तट पर अलर्कपुरी नाम की राजधानी बनायी जिसे अरैल के नाम जाना जाता है।

अलर्क को भोगों में लिप्त देख बड़े भाई सुबाहु ने काशिराज की सहायता से उस पर आक्रमण कर दिया तो अलर्क ने अंगूठी से माता का उपदेश निकाल पढ़ा। जिसमें लिखा था कि आसक्ति का सब तरह से त्याग करना चाहिए किंतु यदि उसका त्याग न किया जा सके तो सत्पुरुषों का साथ करना चाहिए। कामना को छोड़ देना चाहिए किंतु यदि संभव न हो तो मोक्ष की कामना करनी चाहिए। इस संदेश को पढ़ विचार करते हुए अलर्क ने महात्मा दत्तात्रेय जी की शरण ली और अपने जीवन का कृतार्थ कर लिया। इस तरह मदालला ने अपने पुत्रों का उद्धार कर स्वयं भी पति के साथ परमात्मा के चिंतन में मन लगाया और मोक्ष प्राप्त किया।  

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