उपाजय ने राजा द्रुपद से कहा, आप मेरे बड़े भाई याज से मिले जो जंगल में घूम रहे हैं।

Dharma : द्रोणाचार्य का वध करने वाले पुत्र की कामना से भटके राजा द्रुपद, जानिए कैसे हुआ उनके पुत्र व पुत्री का जन्म

Dharma : एकचक्रा नगरी के बाहर जंगल में रहने वाले बकासुर को मार कर भीम ने अपने आश्रयदाता ब्राह्मण परिवार की ही नहीं बल्कि पूरी नगरी की रक्षा की। 

सदाचारी ब्राह्मण ने सुनाई द्रुपद के पुत्र पुत्री की कथा

ऋषि वैशम्पायन ने राजा जनमेजय को उनके पूर्वज पांडवों की आगे की कथा बताते हुए कहा कि बकासुर को मारने के बाद पांडव वेदाध्ययन करते हुए उसी ब्राह्मण के घर पर निवास करने लगे। कुछ समय के बाद वहां एक सदाचारी ब्राह्मण आए तो कुन्ती और पांचों पांडव उनकी सेवा करते रहे। उन्होंने मंदिरों तीर्थों और राजाओं की जानकारी देते हुए बताया कि द्रुपद की कथा एवं उनकी पुत्री द्रौपदी का स्वयंवर होने की बात कही। द्रौपदी के जन्म की कथा पूछने पर उन्होंने बताया कि पांडवों के सहयोग से द्रोणाचार्य ने उन्हें जब से पराजित कराया है वे सोच में डूब कर दुबले होते जा रहे हैं। वे द्रोणाचार्य से बदला लेना चाहते हैं। वे इसी सोच में एक से दूसरे कर्मसिद्ध ब्राह्मणों की तलाश करने लगे। उन्होंने कश्यप गोत्र के याज और उपाजय नाम के दो ब्राह्मण भाइयों के पास पहुंचे और पहले उपाजय को सेवा कर संतुष्ट कर प्रार्थना कर ऐसे पुत्र की कामना की जो द्रोणाचार्य को मार सके।  उपाजय ने ऐसा करने से मना किया तो भी द्रुपद उनकी एक साल तक सेवा करते रहे।

यज्ञ से जन्मे राजा द्रुपद के पुत्र और पुत्री

उपाजय ने राजा द्रुपद से कहा, आप मेरे बड़े भाई याज से मिले जो जंगल में घूम रहे हैं। द्रुपद उन्हें प्रणाम कर तुरंत उपाजय के बड़े भाई याज के पास पहुंचे और प्रणाम कर बोले, मैं द्रोण से श्रेष्ठ और उनको मारने वाला पुत्र चाहता हूं। आप इसके लिए यज्ञ कराइए और मैं आपको 10 करोड़ गायें दूंगा। याज ब्राह्मण ने उनके पांचाल राज्य में पहुंच कर यज्ञ कराया तो अग्निकुंड से एक दिव्य कुमार प्रकट हुआ। उसके सिर पर मुकुट, शरीर पर कवच और हाथों में धनुष बाण था। अग्निकुंड से निकलते ही वह दिव्यकुमार घोड़े पर सवार हो इधर-उधर घूमने लगा। तभी आकाशवाणी हुई, इस पुत्र के जन्म से द्रुपद का सारा शोक मिट जाएगा, यह द्रोण को मारने के लिए ही पैदा हुआ है। उसी वेदी से देवांगना जैसी एक युवती पांचाली का भी जन्म हुआ। उसके जन्म पर फिर से आकाशवाणी हुई, यह रमणीरत्न कृष्णा है, देवताओं का प्रयोजन सिद्ध करने के लिए क्षत्रियों के संहार के उद्देश्य से उसका जन्म हुआ है और इसके कारण ही कौरवों को डर लगेगा। उसी समय यज्ञ करा रहे याज से रानी ने प्रार्थना की, ये दोनों मेरे अतिरिक्त किसी और को अपनी मां न मानें। यज्ञाचार्य ने कहा ऐसा ही होगा।

द्रुपद के शत्रु ने धृष्टघुम्न को युद्ध कला सिखाई

ब्राह्मणों ने दिव्य कुमार का नामकरण करते हुए कहा कि यह ढीठ यानी धृष्ट और असहिष्णु है, बल रूप कवच कुंडस आदि से संपन्न है। इसकी उत्पत्ति अग्नि य़ानी द्युति से हुई है इसलिए इसका नाम “धृष्टघुम्न” और कुमारी कृष्ण वर्ण की है इसलिए इसका नाम “कृष्णा” होगा। यज्ञ पूरा होने पर द्रोणाचार्य यह जानते हुए भी इसके हाथों ही मेरा वध होगा फिर भी उन्होंने धृष्टघुम्न को अस्त्र शस्त्र की शिक्षा देकर निपुण किया।  

Leave a Reply