जंगल में श्री राम को एक आम आदमी की तरह पत्नी के वियोग में भटकते हुए देखा तो उन्हें उनके सच्चिदानंद भगवान होने पर संदेह हुआ किंतु वापस आकर उन्होंने भगवान शंकर से झूठ ही बोल दिया. उनके झूठ बोलने की बात महादेव क्षण भर में समझ गए और उसी समय मन ही मन निश्चय कर लिया कि इस जीवन में तो उन्हें पत्नी के रूप में नहीं स्वीकार किया जा सकता है. इसी बात का विचार करते हुए वह मौन हो गए और उन्हें देखकर सती जी भी चिंतित हो गयीं.
बर्दाश्त के बाहर होता है झूठ बोलने का फल
सती की चिंता देख कर महादेव उन्हें कई तरह की कथाएं सुनाते हुए कैलास पर्वत की ओर जाने लगे. कैलास पहुंचते ही महादेव एक बड़ के नीचे पद्मासन में बैठ सब कुछ भूल कर अखंड समाधि में लीन हो गए. सती वहीं कैलास में रहने लगे किंतु उनका दिल दुख से भरा रहा. सती के लिए एक दिन एक-एक युग के समान होने लगा. सती मन ही मन विचार करने लगीं कि दुख के इस समुद्र से कभी पार भी हो पाएंगी या जीवन भर इसी दुख में रहना होगा. उन्हें लगा कि यह सब श्री रघुनाथ के प्रति अश्रद्धा का भाव रखने और पति से झूठ बोलने के कारण ही हो रहा है. विधाता ने मुझे अपने गलत कर्मों का ही दंड दिया है, जिसे मुझे ही भोगना होगा. विचार करते-करते वह गहराई में खो गईं और कहने लगीं कि आपकी सारी बातें ठीक हैं जो आपने मुझे मेरी गलतियों की सजा दी है, किंतु भगवान शंकर के विमुख होने के बाद भी आप मुझे जिंदा क्यों रखे हुए हैं.
