स्वाम्भुव मनु और उनकी पत्नी शतरूपा से ही मानव सृष्टि का आरंभ हुआ।

Shri Bhaktamal : श्री शतरूपा जी की कथा

Shri Bhaktamal : स्वाम्भुव मनु और उनकी पत्नी शतरूपा से ही मानव सृष्टि का आरंभ हुआ। ब्रह्मा जी के शरीर के दाहिने भाग से मनु और बाएं भाग से शतरूपा की उत्पत्ति हुई। बृहदारण्यक उपनिषद् में बताया गया है कि मनुष्य ही नहीं सैकड़ों तरह के पशु-पक्षी भी इन्हीं दोनों की संतानें हैं। श्री भक्तमाल ग्रंथ के अनुसार शतरूपा ने प्रथम समागम के समय सैकड़ों रूप धारण किए जिनके कारण उनका नाम शतरूपा पड़ा। इसी तरह मनु ने भी उसी तरह के रूप धारण किए और हर किसी से एक-एक संतान छोड़ दी जिससे मानव सृष्टि की रचना हुई। 

स्वाम्भुव मनु ब्रह्मावर्त के राजा थे और बर्हिष्मती उनकी राजधानी थी जहां पृथ्वी को रसातल में ले आने के बाद शरीर कांपते समय वाराह भगवान के रोम झड़कर गिरे थे। वे रोम ही कुश और काश हुए जिनसे मुनि दैत्यों का तिरस्कार कर भगवान यज्ञपुरुष की आराधना करते। कुशों को बर्हिष कहा जाता है और अधिकता होने के कारण ही उस नगरी को बर्हिष्मती कहा जाने लगा। मनु और शतरूपा के दो पुत्र उत्तानपाद और प्रियव्रत तथा कन्याएं आकूति, प्रसूति और देवहूति थीं। भगवान के भक्त ध्रुव इन्हीं राजा उत्तानपाद के पुत्र थे। राजा प्रियव्रत ने संपूर्ण पृथ्वी को सात भागों में बांटा। आकूति का विवाह रुचि प्रजापति, प्रसूति प्रजापति दक्ष और देवहूति का विवाह कर्दम ऋषि से हुआ था। देवहूति के गर्भ से ही सांख्य शास्त्र के प्रणेता महर्षि कपिल का अवतार हुआ था।

महाराज मनु को शासन करते हुए चौथापन आ गया किंतु विषयों से आसक्ति बनी रही तभी उन्हें विचार आया कि उन्होंने भगवान का स्मरण नहीं किया तो अपने पुत्र को राज्यभार सौंप कर स्वयं पत्नी शतरूपा के साथ वन की ओर भगवान की आराधना करने चले गए। हजारों सालों तक तपस्या करने के बाद भगवान श्री राम ने माता सीता के साथ उन्हें दर्शन दिए। उन दोनों की मनोहर छवि को देख मनु और शतरूपा की आंखें खुली की खुली रह गयीं। दोनों ने हाथ जोड़ उन्हें प्रणाम किया और कहा कि आपके दर्शन से सारी अभिलाषा पूरी हो गयी, बस एक ही इच्छा है कि आपके जैसा पुत्र हो। भगवान ने कहा कि अब मैं अपने जैसा कहां ढूंढूंगा, जाओ मैं ही तुम्हारा पुत्र बनूंगा। इसके बाद शतरूपा से कहा कि तुम भी कुछ वर मांग लो तो उन्होंने कहा कि मेरे पति को जो प्रिय है वही मुझे भी प्रिय है। इस पर श्री राम ने उन्हें माता कह कर संबोधित किया और अंतर्ध्यान हो गए। इंद्रलोक में कुछ काल तक रहने के बाद वही अयोध्या के राजा दशरथ हुए और शतरूपा माता कौशल्या तथा श्री राम को पुत्र के रूप में प्राप्त कर दोनों धन्य हो गए।    

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