श्री शेष जी जिन्हें शेषनाग या आदिशेष भी कहा जाता है, एक दिव्य सर्प हैं और भगवान आदि पुरुष नारायण की शैय्या के रूप में जाने जाते हैं और क्षीरसागर में रहते हैं।

Shri Bhaktamal : श्री शेष जी की कथा

Shri Bhaktamal : श्री शेष जी जिन्हें शेषनाग या आदिशेष भी कहा जाता है, एक दिव्य सर्प हैं और भगवान आदि पुरुष नारायण की शैय्या के रूप में जाने जाते हैं और क्षीरसागर में रहते हैं। जब-जब पृथ्वी पर भगवान विष्णु ने अवतार लिया, वे किसी न किसी रूप में उनके साथ ही रहे। मान्यता है कि उनके हजारों फन हैं और उन्हीं फनों पर वे पृथ्वी का भार सहन करते हैं। 

श्री भक्तमाल ग्रंथ के अनुसार शास्त्रों में भगवान के पंचविध स्वरूप माने गए हैं जो परब्रह्म, चतुर्व्यूह, अवतार, अंतर्यामी अर्थात सर्वव्यापी और अर्चावतार यानी मूर्ति पूजा। चतुर्व्यूह स्वरूप में ज्ञान और बल दो गुणों की प्रधानता होती है। यही शेष अथवा अनन्त के रूप में पाताल मूल में रहते हैं और प्रलय के समय इन्हीं के मुख से अग्नि प्रकट हो कर सारे जगत को भस्म कर देती है। त्रेतायुग में श्री राम के रूप में भगवान नारायण के अवतार लेने पर लक्ष्मण के रूप में और द्वापर युग में श्री कृष्ण के रूप में अवतार लेने पर बलराम के रूप में आए। महर्षि कश्यप और उनकी पत्नी कद्रू के सौ नागपुत्रों में से एक शेषनाग है जो अपनी माता और भाइयों के छल से दुखी और नाराज हो कर तपस्या करने चले गए और ब्रह्मा जी से भगवान नारायण के साथ रहने का वरदान प्राप्त किया। 

श्री शेषनाग जी अपने हजारों मुखों से निरन्तर भगवान के गुणों का गान करते रहते हैं और अनादि काल से करते हुए भी कभी नहीं ऊबते। ये भक्तों के परम सहायक हैं और जीव को भगवान की शरण में ले जाने का कार्य करते हैं। इन्हीं गुणों के कारण सारे देवता इनकी वंदना करते हैं। इनके बल, पराक्रम, प्रभाव और स्वरूप को जानने अथवा वर्णन करने की सामर्थ्य किसी में भी नहीं है। गंधर्व, अप्सरा, सिद्ध, किन्नर, नाग आदि कोई भी इनके गुणों की थाह नहीं लगा पाता है इसीलिए इन्हें अनंत भी कहा जाता है। वे भगवान के निवास, शैय्या, आसन, पादुका, वस्त्र, तकिया और छत्र के रूप में शेष अर्थात भगवान में समाए होने के कारण ही शेष कहलाते हैं।

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